(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 307

292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

विधान के कुछ भागों को रद्द घोषित कर देगी। क्या सभा चाहती है कि संविधान के अनुच्छेद 13 के उपबंधों के अनुरूप न्यायपालिका हिंदू विधान का संवीक्षण करे और जब मामले न्यायालय में जायें तो हिंदू विधान के नियमों को एक-एक करके रद्द कर दिया जाये या सभा स्वयं हिंदू विधान में इस प्रकार सुधार लाना चाहेगी कि वह अनुच्छेद 15 के साथ संगत बैठे और अनुच्छेद 13 के अधीन रद्द घोषित किये जाने के खतरे से बच जाये? यदि सभा यह नहीं चाहती कि न्यायपालिका हिंदू विधान के नियमों को एक-एक करके रद्द घोषित करे, बल्कि वह हमारे संविधान के प्रावधानों के अनुसार एक समेकित प्रणाली बन जाये तो मेरा निवेदन यह है कि इस मामले के विचार को स्थगित करना सभा की बहुत बड़ी गलती होगी।

महोदय, मेरे विचार में ये अत्यन्त महत्वपूर्ण कारण हैं और इसलिये सभा को इस मामले पर विचार को न स्थगित करना चाहिए और न ही उसमें विलम्ब करना चाहिए। इसलिये मुझे आशा है कि सभा मेरे प्रस्ताव को स्वीकार करेगी और इस विधेयक पर विचार के चरण को पूरा कर लेगी।

डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैयाः क्या मैं स्पष्टीकरण के लिए एक बात पूछ सकता हूँ? डॉ. अम्बेडकर ने कहा है कि ऐसे सभी उपबंध जो संविधान के किसी अनुच्छेद जिसको उन्होंने उद्धृत किया है, के साथ मेल नहीं खाते, रद्द कर दिया जायेगा। क्या उनका विचार यह है कि 26 जनवरी को, जब नया संविधान लागू हो जायेगा और उनके द्वारा उद्घृत अनुच्छेद भी, निश्चित रूप से प्रवर्तन में आ जाएगा, उस दिन हिंदू विधान का यह सारा भाग रद्द हो जायेगा और वह स्थान रिक्त हो जायेगा? क्या इससे अधिक अनुचित कल्पना की जा सकती है?

माननीय अध्यक्षः शांति, शांति! माननीय सदस्य की यह अपनी राय हो सकती है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैंने, अपने मित्र डॉ. पट्टाभि सीतारमैया के सम्बन्ध में बहुत आत्म संयम से काम लिया है। वह मुझसे भी कुछ सुन लेते, यदि मैंने वह सब कुछ कह दिया होता, जो मैं कहना चाहता था।

माननीय अध्यक्षः मूल प्रस्ताव के सम्बन्ध में दो संशोधन हैंः हिंदू विधान की कुछ शाखाओं में संशोधन करने और संहिताबद्ध करने के लिये, जैसे कि प्रवर समिति ने अपने प्रतिवेदन में कहा है। विधेयक पर विचार किया जाये। मैं पहले संशोधनों को सभा के मतदान के लिये रखूंगा। पहला संशोधन श्री नजीरुद्दीन अहमद का है जिसमें विधेयक को वर्ष 1949 के अन्त तक अभिमत प्राप्त करने के लिये परिचालित करने का सुझाव दिया गया है। तिथि बढ़ाने की बात में बहुत विलम्ब हो चुका है।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः महोदय, क्या मैं स्थिति स्पष्ट कर सकता हूँ?