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सैद्धान्तिक चरित्र के हैं कि जब कभी उनकी सीमाएं पार की जाती हैं, तो गलतियों के सिवाय और कुछ नहीं प्राप्त होता। यह सिद्धांत ‘में के संसदीय व्यवहार’ में दिया गया है, जो संसद के परिपाटी की माँ मानी जाती है। परिपाटी है कि जैसे ही विधेयक प्रस्तुत किया जाता है, वह उस सदस्य के हाथों से बाहर हो जाता है जिसने उसे प्रस्तुत किया था और वह सदन की शक्ति के घेरे में आ जाता है। मैं ‘में की संसदीय व्यवहार’ के उन शब्दों का अनुवाद कर रहा हूँ जिन्हें मैं शीघ्र ही आपको पढ़कर सुनाऊंगा।
माननीय उपाध्यक्षः मैं यह नहीं सोचता कि सदन में किसी भी व्यक्ति को इस बात का संदेह है कि किसी माननीय सदस्य वह विधेयक प्रस्तुत करने वाला भी हो सकता है, उसे विधेयक में परिवर्तन करने का अधिकार है। यदि उसने वह विधेयक सदन के समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया है जैसाकि मैं समझता हूँ कि माननीय अध्यक्ष का आदेश है कि यह विधेयक प्रवर समिति द्वारा विचार किया गया था, इसलिए उस स्थिति के बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है। माननीय विधि मंत्री ने यह नहीं कहा था कि प्रवर समिति द्वारा किसी अन्य विधेयक पर विचार किया गया था, यद्यपि अन्य मसौदा जिसे उन्होंने चयन समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, पर मूल विधेयक के साथ विचार किया गया था। चूंकि कोई भी माननीय सदस्य, टुकड़ों-टुकड़ों में संशोधन प्रेषित करने की बजाय प्रवर समिति के समक्ष संशोधन प्रस्तुत करने का अधिकार रखता है, उसके अनुसार उन्होंने अपने सभी संशोधनों को मुद्रित किया है और समिति के समक्ष रखा है। माननीय अध्यक्ष महोदय का यह आदेश है। इसको छोड़कर माननीय सदस्य आगे वक्तव्य दे सकते हैं। कोई भी संसदीय व्यवहार में बतायी गई स्थिति पर संदेह नहीं कर सकता कि एक सदस्य के लिए खुली छूट नहीं है चाहे वह विधेयक का प्रस्ताव ही क्यों न हो कि वह उस विधेयक में कोई परिवर्तन कर सके, यदि सदन ने उस विधेयक को अपने कब्जे में ले लिया है। माननीय अध्यक्ष ने कहा है कि ऐसा नहीं किया गया है। हम इससे बाध्य हैं, अन्यथा माननीय सदस्य अपना भाषण जारी रख सकते हैं।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः आपके मन को सुनने के बाद मैं केवल यही निवेदन करना चाहता था कि मैं अपने विश्वास पर और अधिक निष्ठावान हो गया हूँ। आपने यह निर्णय किया है कि यदि यह किसी प्रकार सिद्ध हो जाता है कि वास्तव में, इस विवादास्पद प्रश्न पर कोई संशोधन प्रवर समिति के समक्ष नहीं आये हैं, तो यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि पुनः मसौदा तैयार किए हुए विधेयक पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। इस कारण से मैं यह निवेदन करना चाहूँगा कि मुझे आपके समक्ष उस आदेश को फिर से उल्लेख किए जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। श्रीमान मेरे पास 1873 के हंसार्ड खंड 215 का आदेश है जिसमें पृष्ठ 302 पर यह दिया गया है कि यदि कोई सदस्य किसी विधेयक के प्रस्तुत करने का नोटिस देता है और वह विधेयक मुद्रित है, तो वह सदस्य द्वितीय वाचन के पूर्व उस विधेयक में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता