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सकती है और न निर्णय लिया जा सकता है। वे विधेयक की तह तक जाते हैं। प्रत्येक खंड लगभग नया और महत्वपूर्ण विषय है। प्रत्येक खंड पर विस्तृत रूप से विचार करने की आवश्यकता है। इसलिये मेरा निवेदन यह है कि सरकार को हमें समय देना चाहिए और गोल मेज सम्मेलन में बैठने के लिये तैयार होना चाहिए, जिससे सभी मतभेदों का समाधान निकाला जा सके और एक ऐसा विधेयक तैयार किया जा सके, जो सभा को काफी हद तक स्वीकार्य हो। इन विषयों पर सभा में जल्दबाजी में निर्णय नहीं लिया जा सकता।
इस बीच बड़ी-बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। कई भारतीय राज्य शामिल हो गये हैं। उनकी राय नहीं ली गयी। मेरे विचार में कृषि भूमि इस विधेयक के अधीन आ गयी है। इससे एक नयी स्थिति हो गयी है। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सरकार की ओर से अनेक संशोधन आ रहे हैं, भौगोलिक दृष्टि से क्षेत्र का भी विस्तार हो गया है और विषय भी बढ़ गये हैं, मेरे विचार में पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए जिससे माननीय सदस्य विधेयक पर पूर्ण रूप से विचार कर सकें। इन मतभेदों को दूर करने के लिये कोई समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। ताकि कोई ऐसा सूत्र तैयार किया जा सके जो सब को नहीं तो कम से कम बड़ी संख्या के लोगों को स्वीकार्य हो। इस प्रकार के विवादास्पद विधान पर विचार के लिये हमें काफी समय मिलना चाहिए। प्रथम वाचन के दौरान मैंने जो दृष्टिकोण रखा था वह इस बात को देखते हुए बिल्कुल सही था कि उस समय हिंदु समुदाय का ध्यान व्यापक रूप से इस ओर नहीं दिलाया गया था। मेरी अपील इस लिहाज से भी उचित सिद्ध होती है कि सरकार स्वयं बड़ी संख्या में महत्वपूर्ण संशोधन लायी है। मेरा काम हो गया है। मैंने उस समय सोचा था कि मैं कुछ दोषों की ओर ध्यान दिला कर, जिन पर शायद अन्यथा किसी का ध्यान न जाता, अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा हूँ। किस प्रकार की विधि इस सभा और हिंदू समुदाय के लिये ठीक होगी, यह सोचना मुख्य तौर पर हिंदुओं का काम है। मुख्य रूप से इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है कि हिंदू संहिता विधेयक किस रूप में पारित हो। मेरा काम तो कुछ व्यावहारिक बातों की ओर ध्यान दिलाना था और संशोधनों के बारे में सुझाव देना था। मेरे विचार में सरकार को इन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए और हमें बताना चाहिए कि वे क्या करना चाहते हैं और मैं विधेयक को पारित करवाने में रचनात्मक सहयोग देने के लिये तैयार हूँ। मेरी व्यक्तिगत रूप से इसमें कोई रुचि नहीं है कि विवादास्पद की सही शक्ल क्या होगी यद्यपि ऐसी बात भी नहीं कि मैं उसमें बिल्कुल रुचि नहीं रखता। मेरा निवेदन यह है कि ये ऐसी बातें हैं कि इनसे सरकार महसूस करेगी कि इनके लिये पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए और मतभेदों को दूर करने लिये कोई समुचित व्यवस्था की जानी चाहिए ताकि कोई ऐसी संहिता तैयार की जा सके जो सभी अधिकांश सदस्यों को काफी हद तक स्वीकार्य हो। मुझे इतना ही कहना है।
श्री सिधवा (मध्य प्रदेश)ः महादेय, मैं एक जानकारी चाहता हूँ। माननीय सदस्य के दो संशोधन थे, एक अनिश्चित काल के लिये स्थगन के बारे में था और...