(प्रवर समिति की रिपोर्ट के प्रस्तुत करने के लिए समय-सीमा में वृद्धि) - Page 317

302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

लिये सांकेतिक रूप में सभा ने विधेयक पर खंडवार विचार करने की सहमति दे दी है। मैं अनुरोध करता हूँ कि आप खंड 2 को सभा में मतदान के लिये रख दीजिए और तत्पश्चात् हम चर्चा को स्थगित कर देंगे।

श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरे विचार में इन वक्तव्यों का निशाना मैं ही हूँ। मैं यह वचन देने को तैयार हूँ कि मैं कोई विलम्बकारी प्रस्ताव नहीं लाऊंगा।

माननीय अध्यक्षः विधि मंत्री और श्री नजीरुद्दीन अहमद द्वारा अपनी-अपनी स्थिति स्पष्ट कर देने तक ही यह मामला सीमित नहीं है, बल्कि श्री चौधरी की भी समस्या है। इसलिये मेरा विचार यह है कि मैं प्रस्तावों को सभा में रख देता हूँ और वह उन पर मतदान कर सकते हैं।

श्री आर.के. चौधरीः परन्तु महोदय मैं अपने प्रस्ताव की व्याख्या करना चाहता हूं।

माननीय अध्यक्षः माननीय सदस्य उनकी व्याख्या कर चुके हैं। इस पर और समय लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

श्री एम.ए. आयंगरः क्या मैं श्री चौधरी को बता सकता हूँ कि चूंकि उनके प्रस्ताव का विषय यही है कि इस प्रश्न को विशेष सत्र बुलाये जाने तक स्थगित किया जाये, हम कल्पना कर सकते हैं कि वह गिर गया है। विशेष सत्र बुलाना असम्भव बात है। फिर भी इस बात को सरकार पर छोड़ते हैं। वह कोई सुविधाजनक समय निश्चित करने के लिये बजट सत्र के साथ भी जोड़ सकते हैं। वह विशेष सत्र ही क्यों चाहते हैं? यदि सरकार आवश्यक समझेगी तो वह अपने आप बुला लेगी। विशेष सत्र बुलाने का वचन लेने मात्र से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

डॉ. पट्टाभि (मद्रास)ः सरकार के रवैये में कुछ बदलाव आया है और वह इस विषय पर सोच-समझ कर विचार करने के अनुकूल हैं। मैं इस विषय का विस्तार से वर्णन नहीं करना चाहता। परन्तु मुझे माननीय विधि मंत्री के एक शिक्षक की तरह यह कहने पर निश्चय ही आपत्ति है कि इस प्रकार स्थगन की मांग को स्वीकृति नहीं दी जायेगी। यह स्वीकृति दी जानी चाहिए। विरोध के उचित तरीकों का उपयोग करने का प्रत्येक सदस्य को अधिकार है। मैं बालफोर के कथन में विस्तृत रूप से नहीं जाना चाहता, जिसने कहा था कि सरकार का विरोधी, यथा सम्भव सब प्रकार के उचित साधनों का उपयोग करके विरोध कर सकता है और यदि आवश्यक हो तो गलत तरीकों से भी विरोध कर सकता है। मैं केवल इतना कहना चाहूंगा कि जब प्रधानमंत्री ने अपनी असीम बुद्धिमत्ता से स्वीकार कर लिया है कि दो प्रकार की विचारधारा है और उन्होंने खुले दिन से और उचित तरीके से प्रस्ताव के स्थगन को स्वीकार कर लिया है, इस बात को ध्यान में रखते हुए माननीय विधि मंत्री का प्रोफेसर, शिक्षक और धर्माध्यक्ष जैसा व्यवहार वांछनीय नहीं है। इससे अलगाव की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा जो लगभग शांत हो गई है।