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श्री नजीरुद्दीन अहमदः जिस विरोधी पक्ष की कल्पना की जाती है, वह अब यहां पर नहीं है।
श्री जवाहर लाल नेहरूः मैं इस बात को पूरी तरह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि विधि मंत्री ने जो कुछ कहा है, मैं उनके प्रत्येक शब्द से सहमत हूँ। प्रत्येक व्यक्ति महसूस करता है कि इस विषय पर विचार करने के लिये पूरा समय दिया जाना चाहिए और इसीलिये हमने सभा को यह सुझाव देने का निर्णय किया है कि खंडवार चर्चा बाद में हो जायेगी। हमको प्रस्ताव के स्वरूप के बारे में निर्णय कर लेना चाहिए। यदि यह विस्तृत प्रस्ताव है और यदि माननीय सदस्य चाहते हैं कि उस पर विचार किया जाये, तो उस पर अभी विचार कर लेना चाहिए। हम उस प्रस्ताव को स्थगित नहीं करना चाहते। मैं किसी प्रस्ताव को रोकना नहीं चाहता। यदि हमारे समक्ष विस्तृत प्रस्ताव है, तो उस पर निर्णय अभी और आज ही कर लेना चाहिए।
पंडित मालवीय (उत्तर प्रदेश)ः हम जानते हैं कि इस मुद्दे पर भारी मतभेद हैं, इस सभा के विभिन्न समूहों के बीच अत्यधिक मतभेद हैं। हमारे प्रधानमंत्री का व्यावहारिक दृष्टिकोण है जैसा कि हम उनसे सदा आशा करते हैं, उन्होंने इस मामले में भी हमारा नेतृत्व किया है और कहा है यह विवादास्पद मामला है जिस पर पर्याप्त समय देना होगा। क्या मैं इस बात की अपील कर सकता हूँ कि चूंकि यह मामला स्थगित किया जाना है, अतः किसी प्रस्ताव पर या धारा पर चर्चा जारी रखने का कोई अर्थ नहीं होगा। क्योंकि इस मामले पर बहुत अधिक मतभेद हैं और हिंदू संहिता पर अब विचार करने से भी उनके अधिनियम की तिथि आगे नहीं बढ़ सकती। क्या में विनम्रतापूर्वक निवेदन कर सकता हूं कि यदि हम इस मामले को यहीं का यहीं छोड़ देते हैं, तो किसी धारा या विचार का महत्व कम नहीं हो जायेगा। यदि विधेयक पर विचार करने का इरादा होता और वास्तव में कोई प्रगति होती तो मैं कुछ नहीं कहता, क्योंकि फिर तो सभी सदस्यों को अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलता है और तब सभा सामूहिक बुद्धिमत्ता से जो भी निर्णय करती, वही विधि पुस्तक में आ जाता। परन्तु अब सुझाए गये कार्यक्रम के अनुसार कोई यथार्थ प्रगति नहीं होगी। मेरा सुझाव यह है कि देश में व्याप्त भारी चिन्ता और विरोध की स्थिति और गहरी या बिगड़नी नहीं चाहिए। मुझे पता है कि दुर्भाग्य से कुछ लोगों का ऐसा भी विचार है कि देश कुछ भी सोचे, इसकी परवाह नहीं करनी चाहिए। परन्तु एक दूसरा विचार यह है कि प्रश्न के प्रत्येक पहलू पर भली-भांति विचार करना चाहिए और उसका आदर करना चाहिए। मैं अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहता। परन्तु मैं सरकार से अवश्य अनुरोध करूंगा कि उस पर क्या निर्णय किया जाये। माननीय विधि मंत्री का विचार यह प्रतीत होता है कि सभा संवैधानिक रूप से या कानूनी रूप से नहीं, बल्कि नैतिक रूप से इस स्थिति से वचनबद्ध है कि विधेयक को स्थगित करवाने के विचार से कोई विलम्बकारी प्रस्ताव नहीं लाना चाहिए...
डॉ. अम्बेडकरः यही बात है।