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माननीय अध्यक्षः फिर तो स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है। मैं उसको सीधे ही मतदान के लिये रख देता हूँ और फिर हम आगे बढ़ेंगे। मैं श्री आर.के. चौधरी के प्रस्ताव को सभा में मतदान के लिये रखने जा रहा हूँ।
श्री आर.के. चौधरीः महोदय, मैंने समझ-बूझकर और दोबारा विचार कर निर्णय किया है कि मैं अपने प्रस्ताव पर जोर नहीं देता।
माननीय अध्यक्षः इसलिए, क्योंकि मामले पर अब खूब समझ कर विचार कर लिया गया है चलिए हम इसको स्थगित करते हैं और सरकार इसके लिये तिथि निश्चित करे...
कुछ माननीय सदस्यः उनको सभा की अनुमति से प्रस्ताव वापिस लेना चाहिए।
माननीय अध्यक्षः हमारा नियम यह है कि जब प्रस्ताव प्रस्तुत नहीं किया गया है, तो अनुमति की आवश्यकता नहीं है।
श्रीमती दुर्गाबाई (मद्रास)ः मैं जानना चाहती हूँ कि क्या यह स्थगन प्रस्ताव विचाराधीन है?
माननीय अध्यक्षः अब सब कुछ निरर्थक हो गया है। जो स्थगन प्रस्ताव उन्होंने रखे थे, वे निरर्थक हो गये हैं। अब कुछ नहीं रहा। उनसे पूछ लिया गया है और वे उन पर जोर नहीं देते। जहाँ तक अन्य ऐसे सदस्यों का प्रश्न है, जिन्होंने ऐसे प्रस्ताव रखे थे, पर जब उनको प्रस्ताव रखने के लिये नाम पुकारा गया, तो वे उपस्थित नहीं थे। यह वह स्थिति है। अब वाद-विवाद को स्थगित किया जा रहा है। सभी लोगों को सदा के लिये बांधे रखना सम्भव नहीं है। यदि परिस्थितियां बनो, तो हम उनसे फिर मिलेंगे।
श्री त्यागीः केवल ऐसे व्यक्तियों से जिन्होंने प्रस्तुत किये हैं...
माननीय अध्यक्षः दुर्भाग्य से माननीय सदस्य ने चर्चा को ठीक से नहीं समझा। मैंने कोई प्रस्ताव सभा के समक्ष नहीं रखा। जब तक मैं कोई प्रस्ताव सभा के समक्ष न रखूं, उस पर सभा के मतदान अथवा उसको वापस लेने का कोई प्रश्न ही नहीं है।
श्री त्यागीः तब इसमें नैतिक कर्तव्य की कोई बात नहीं?
माननीय अध्यक्षः नैतिक कर्तव्य तो है।
श्री त्यागीः मैं ही अनैतिक बनना चाहूँगा।
श्रीमती दुर्गाबाईः प्रस्तावों को प्रस्तुत किया गया, परन्तु उन पर जोर नहीं दिया गया।