संपादकीय - Page 325

310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

डॉ. अम्बेडकर ने समेकीकरण तथा संहिताकरण के कारणों के बारे में स्वयं ही स्पष्ट ढंग से बताया था। अस्त-व्यस्त हिंदू कानून को वैध निर्णयों के रूप में स्पष्ट अभिकथनों का स्वरूप प्रदान किया। इस संहिताकरण द्वारा उसका संहिताकरण, न्यायाधीशों द्वारा निर्मित विधि को वैधानिक मान्यता प्रदानकरना था। बेजामिन नाथन कार्डोंज द्वारा लिखित एक लेख ‘नेचर ऑफ जुडीशियल प्रोसेस’ में कहा गया है कि विधि को स्थायी होते हुए भी इतना परिवर्तनशील होना चाहिए कि वह बदलते समय की आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य कर सके।य् विधेयक के सिद्धान्तों का संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मत अनुमोदन डॉ. अम्बेडकर के विधि-नैपुण्य के साथ-साथ संविधान सभा के अन्य सदस्यों की सूझ-बूझ के प्रति भी एक श्रद्धांजलि है। विधेयक में उल्लखित सिद्धान्त स्त्री-पुरुष की समानता के संवैधानिक दर्शन से पूरी तरह मेल खाते हैं।

यहां यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विधेयक बरास्ता विधि सामाजिक सुधार का एक भाग था। यह उस समय के हिसाब से एक क्रांतिकारी कदम था। संविधान सभा में इस विषय पर हुए वाद-विवादों में कड़ी प्रतिक्रियायें व्यक्त की गयीं। बहरहाल, इस तरह की कड़ी प्रतिक्रियायें व्यक्त किये जाने से, भाषण की स्वतंत्रता का उच्च ध्येय पूरा हुआ अर्थात् विवादास्पद मुद्दों को उठाने और उन पर विचार-विमर्श का अवसर प्राप्त हुआ। अब जबकि सारा विवाद समाप्त हो चुका है और महिलाएं यदि पुरुषों से अधिक नहीं तो बराबर के अधिकार से सम्पन्न हो चुकी हैं, हमारी नयी पीढ़ी को यह पढ़ते हुए और कल्पना करते हुए कितनी खुशी होगी कि हमारे महान संविधान द्वारा प्रदत्त की गयी स्वतंत्रता का वे कितना लाभ उठा रहे हैं।

हालांकि हिंदू आचार संहिता के समेकन और संहिताकरण का प्रस्ताव विरोध के बावजूद पारित हुआ, फिर भी लोगों ने इसे स्वीकार किया और इसकी प्रशंसा की है।

यह सब, जनता को इस बारे में निरन्तर शिक्षित करते रहने और महिलाओं की दशा सुधारने से संभव हुआ है। महिलाओं से संबंधित हिंदू आचार संहिता में सुधार लाने वाले अधिनियमों की सूची हमारे लिए काफी ज्ञाववर्धक होगीःµ

  1. जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850

  2. हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856

  3. भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925

  4. नेटिव कनवर्ट्स मैरिज डिस्सॅलूशॅन अधिनियम, 1866

  5. 1929 के अधिनियम XX यथा संशोधित 1822 का संपत्ति अंतंरण अधिनियम IV