अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 332

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श्री किशोरी मोहन त्रिपाठी, श्रीमती अम्मू स्वामीनाथन, पं. बालकृष्ण शर्मा, श्री खुर्शीद लाल, श्री ब्रजेश्वर प्रसाद, श्री बी. शिवा राव, श्री बालदेव स्वरूप, श्री वी.सी. केशवराव तथा प्रस्तावक को मिलाकर निर्मित प्रवर समिति को इस निर्देश के साथ सौंप दिया जाये कि वे अगले सत्र के प्रथम सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट दे दें तथा यह कि समिति की बैठक के लिए कम से कम पांच सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी।य्

महोदय, मेरे लिये और मैं समझता हूँ कि सभा के सदस्यों के लिये भी यह बहुत ही खेदजनक और अफसोस की बात है कि हिंदू कानून के संहिताकरण जैसा महत्वपूर्ण विषय सत्र के अन्त में सभा के सामने चर्चा हेतु लाया गया है। माननीय अध्यक्ष द्वारा आज सुबह दी गयी व्यवस्था के अनुसार हमें इस प्रस्ताव पर सात बजे तक चर्चा समाप्त करनी है, जिसमें आधे घंटे का अवकाश भी शामिल है। मैं इसे अपना कर्त्तव्य समझता हूँ कि दी गयी समयावधि के भीतर विधेयक में उठाये गये विभिन्न बिन्दुओं पर माननीय सदस्यों को अपना मत प्रकट करने हेतु अधिकाधिक समय दिया जाये और मैं उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना यथासंभव सहयोग प्रदान करूंगा। सहयोग करने की एकमात्र रास्ता यह हो सकता है कि मैं अपने शुरूआती भाषण को कम से कम समय में अति संक्षेप में पूरा करूं। मुझे खेद है कि मुझे यह निर्णय लेने की आवश्यकता पड़ी लेकिन विधेयक की विशेषताएं इतनी व्यापक हैं कि यदि इसे विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया जाए और वर्तमान हिंदू विधि की पृष्ठभूमि की तुलना में इसके प्रावधानों की व्याख्या की जाए तो मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि इस प्रयास में चार-पांच घंटे से कम समय नहीं लगेगा। परन्तु यह असंभव है। इसलिए सभा से क्षमा प्रार्थना सहित मैं इसके समक्ष केवल वे ही तथ्य रखना चाहूंगा जो बहुत अधिक महत्वपूर्ण हैं और जो वर्तमान विधि से नितांत भिन्न हैं।

महोदय, यह विधेयक हिंदू संहिता के उन नियमों को संहिताबद्ध करने के लिए लाया गया है जो उच्च न्यायालयों और प्रिवी कौंसिलों के निर्णयों के कारण अपना मूल अर्थ खो बैठे हैं, जिनके कारण आम आदमी के लिए संशय और भटकाव उत्पन्न हो जाता है, ऐसे ज्ञात मुद्दों को संहिताबद्ध करना अनिवार्य है। प्रथमतः यह किसी दिवंगत हिंदू (पुरुष या स्त्री) की संपत्ति के अधिकारों से संबंधित कानूनों को संहिताबद्ध करता है जिसकी मृत्यु बिना वसीयत लिखे हुए हो गई हो। दूसरे, यह बिन वसीयत लिखे हुए किसी मृतक की संपत्ति वे विभिन्न उत्तराधिकारियों के बीच वंश की व्यवस्था के कुछ परिवर्तित आकार को स्पष्ट करता है। इस संबंध में दूसरा विषय, भरणपोषण, विवाह, तलाक, अभिग्रहण, अल्पव्यस्कों और उनके संरक्षण के बारे में है। सभा को यह पता चलेगा कि यह विधेयक कितना विस्तृत है और इसकी सीमा कितनी है। हम विरासत के प्रश्न से आरम्भ करते हैं। इस शीर्ष के अन्तर्गत, यह विधेयक नये सिद्धांतों को कम से कम ब्रिटिश भारत के कुछ भाग को अधिनियमित करता है। इस सभा के बहुत से सदस्य, जो कि वकील हैं, जानते हैं कि विरासत के संबंध में हिंदू कानून दो अलग-अलग