अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 333

318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रणालियों से संचालित होते हैं। एक प्रणाली मिताक्षर और दूसरी दायभाग के रूप में जानी जाती है। दोनों प्रणालियों में मौलिक अन्तर है। मिताक्षर के अनुसार किसी हिंदू की संपत्ति उसकी व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है। यह संपत्ति पिता, पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र से संबंधित होती है। इन सभी लोगों का संपत्ति में जन्म से अधिकार होता है और इस वंश परम्परा में किसी भी सदस्य की मृत्यु होने पर यह संपत्ति जीवित व्यक्तियों द्वारा जो कि उसके बाद जीवित रहते हैं, को हस्तांतरित हो जाएगी और मृतक के उत्तराधिकारी को हस्तांतरित नहीं होगी। इस विधेयक में अन्तर्निष्ट हिंदू संहिता दायभाग के नियमों को स्वीकार करती है जिसके अन्तर्गत यह संपत्ति उत्तराधिकारी द्वारा अपनी व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में प्राप्त की जाती है जिसको वह उपहार द्वारा अथवा वसीयत द्वारा अथवा अन्य किसी तरीके से अपनी इच्छानुसार निस्तारित कर सकता है।

इस विधेयक के माध्यम से किया जाने वाला यह मूलभूत परिवर्तन है। दूसरे शब्दों में यह विरासत के नियमों को उस क्षेत्र तक बढ़ाकर सर्वव्यापक बनाता है जिसमें मिताक्षर के नियम अभी भी चल रहे हैं।

उत्तराधिकारियों के बीच उत्तराधिकार के प्रश्न की जब बात होती है तो हम पाते हैं कि मिताक्षर और दायभाग के नियमों के बीच सामान्य प्रकार का मौलिक अन्तर भी है। मिताक्षर नियमों के अन्तर्गत किसी मृतक के सपिण्ड को ही उसके आत्मीय संबंधी से दी जाती है। दायभाग नियम के अन्तर्गत उत्तराधिकार का आधार मृतक के रक्त संबंध से होता है न कि अपिण्ड और सपिण्ड संबंधों से। यह ऐसा परिवर्तन है जो इस विधेयक में समाविष्ट है_ दूसरे शब्दों में, यहाँ पर भी मिताक्षर के नियमों की अपेक्षा दायभाग के नियम ही स्वीकार किए जाते हैं।

किसी हिंदू मृतक के उत्तराधिकार की व्यवस्था में इस सामान्य परिवर्तन के अतिरिक्त, इस विधेयक के माध्यम से चार अन्य परिवर्तन किए जाने हैं। एक परिवर्तन यह है कि विधवा पुत्री, विधवा बहू सभी को विरासत के मामले में पुत्र के समान एक ही श्रेणी में रखा गया है। इसके अतिरिक्त, पुत्री को भी उसके पिता की संपत्ति में भागीदार बनाया गया ह। उसका हिस्सा पुत्र के हिस्से का आधा बताया गया है। यहाँ पुनः मैं बताना चाहता हूँ कि इस विधेयक के माध्यम से जो नया परिवर्तन किया जा रहा है, जहाँ तक स्त्री वर्ग के उत्तराधिकार का संबंध है, वह पुत्री तक ही सीमित है, अन्य सभी स्त्रियों के उत्ताधिकारों को हिंदू महिलाओं का संपत्ति अधिकार अधिनियम, 1937 के द्वारा पहले ही मान्यता मिल चुकी है। अतः इस विधेयक में जहां तक इस भाग का संबंध है, इसमें वास्तव में कोई भी परिवर्तन नहीं है_ इस विधेयक के अधिनियम में अन्तर्विष्ट मात्र उन्हीं प्रावधानों के बारे में कहा गया है जिने बारे में मैं पहले ही कह चुका हूँ।