अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 336

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रखैल को भी आश्रितों की श्रेणी में शामिल किया जाए, परन्तु ऐसा है, यह एक विचारणीय विषय है। भरण-पोषण की जिम्मेदारी उस व्यक्ति पर आ पड़ती है जो मृतक की संपत्ति प्राप्त करता है। जैसा कि मैंने कहा विधेयक के इस भाग में कुछ भी नया नहीं है।

इस विधेयक में एक और महत्वपूर्ण भाग है और यह एक पत्नी द्वारा अलग से भरण-पोषण का दावा करने के अधिकार से संबंधित है। जब वह अपने पति से अलग रह रही हो। सामान्यतः हिंदू कानून के प्रावधानों के अन्तर्गत एक पत्नी अपने पति से भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती यदि वह अपने पति के साथ उसके घर में नहीं रहती है। तथापि, यह विधेयक इस बात की मान्यता देता है कि निःसंदेह कुछ ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जिसमें यदि पत्नी अपने पति से अलग रह रही हो तो उसका कोई कारण होगा जिस पर उसका वश न हो। अतः उसके इन कारणों को तथा उसको अलग से भरण-पोषण देने के अधिकार को मान्यता देना गलत न होगा। परिणामतः यह विधेयक प्रावधान करता है कि एक पत्नी अपने पति से अलग से भरण-पोषण का दावा तभी कर सकेगी यदि वह (पति) (1) किसी कुत्सित बीमारी से पीडि़त हो, (2) उसके पास कोई रखैल हो, (3) निर्दयता का व्यवहार करता हो, (4) उसे (पत्नी को) दो वर्षों से छोड़ रखा हो, (5) उसने अन्य धर्म अपना लिया हो और (6) कोई अन्य कारण जो पत्नी के अलग रहने को न्यायोचित ठहराते हों।

दूसरा विषय जिसके बारे में मैं कहना चाहता हूँ वह विवाह के प्रश्न से संबंधित है। संहिता दो प्रकार के विवाहों को मान्यता देती है। एक को तो ‘सांस्कारिक’ विवाह और दूसरे को ‘सिविल’ विवाह कहा जाता है। जैसा कि सदस्य जानते हैं कि यह वर्तमान नियमों से अलग होता है। वर्तमान हिंदू कानून केवल ‘सांस्कृतिक’ विवाह को ही मान्यता देती है लेकिन यह उसे मान्यता नहीं देती जिसे हम ‘सिविल’ विवाह कहते हैं। जब कोई वैध सांस्कारिक विवाह और वैध पंजीकृत विवाह की शर्तों के बारे में विचार करता है तो संहिता के अन्तर्गत दोनों के बीच वास्तव में बहुत कम अन्तर होता है। किसी सांस्कारिक विवाह की पांच शर्तें होती हैं। पहला, दूल्हे की उम्र 18 वर्ष और दुल्हन की उम्र 14 वर्ष होनी चाहिए। दूसरा, विवाह के समय किसी भी पक्ष की कोई पति/पत्नी नहीं होनी चाहिए_ तीसरे, पक्षों को निषिद्ध संबंधों के स्तर पर नहीं होना चाहिए_ चौथा, दोनों पक्षों को एक दूसरे का सपिण्ड नहीं होना चाहिए और पांचवा, किसी पक्ष को बुद्धिहीन अथवा विक्षिप्त नहीं होना चाहिए। इस तथ्य को छोड़कर कि सपिण्ड का होना सिविल विवाह के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है, अन्य शर्तों में सांस्कारिक विवाह और सिविल विवाह में कोई अन्तर नहीं है। दूसरा अन्तर केवल इतना है कि पंजीकृत विवाह को इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार पंजीकृत होना चाहिए जबकि सांस्कारिक विवाह, यदि पक्ष चाहते हैं तो, पंजीकृत कराया जा सकता है। इस विधेयक में अन्तर्विष्ट विवाह के नियमों और वर्तमान नियमों की तुलना में, यह देखा जा सकता है कि विधेयक के द्वारा उपरिवर्तन