अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 338

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असाध्य अविकसित मष्तिष्क का होना, (5) घातक और असाध्य कुष्ठ रोग से पीडि़त होना, (6) भयानक संक्रामक बीमारी से ग्रसित और (7) निर्दयता।

अब हम अभिग्रहण (गोद लेना) के प्रश्न पर आते हैं। इस विधेयक में दिए गए बहुत से नियम वर्तमान विधि के अन्तर्ग दिए गए नियमों से किसी प्रकार भिन्न नहीं हैं। अभिग्रहण के बारे में इस भाग में दो नये उपबंध हैं। प्रथम, संहिता के अन्तर्गत, पति के लिए यह आवश्यक होगा कि यदि वह अभिग्रहण करना चाहता है तो उसे अपनी पत्नी की और यदि एक से अधिक हों तो कम से कम उनमें से एक की सहमति प्राप्त करना आवश्यक होगा। दूसरे, यह भी निर्धारित करता है कि यदि विधवा अभिग्रहण करना चाहती है तो वह ऐसा तभी कर सकती है यदि उसके पति ने उसे उचित निर्देश देकर अभिग्रहण के लिए अधिकृत किया हो और इस संबंध में किसी मुकदमेबाजी से बचने के लिए, कि क्या पति ने वास्तव में अपनी पत्नी के लिए कोई निर्देश छोड़ा है, संहिता में विधान है कि इस प्रकार के निर्देशों का कोई भी साक्ष्य किसी पंजीकृत दस्तावेज के रूप में अथवा वसीयत के प्रावधानों के रूप में होना चाहिए। कोई मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य नहीं होगा ताकि मुकदमेबाजी की संभावना काफी कम हो। संहिता यह भी प्रावधान करती है कि अभिग्रहण का पंजीकरण के द्वारा भी हो सकता है। इस देश में मुकदमेबाजी के सर्वाधिक उपयोगी साधनों में से एक अभिग्रहण के प्रश्न पर रहा है। सभी प्रकार के मौखिक साक्ष्य बनाये जाते हैं, मिथ्य होते हैं, साक्षियों को मिथ्या शपथ दिलाई जाती है, विधवाओं को मूर्ख बनाया जाता है_ वे एक दिन घोषित करती हैं कि उन्होंने एक अभिग्रहण किया है और बाद में वे स्वीकार करती हैं कि उन्होंने अभिग्रहण नहीं किया और इस प्रकार सभी वादों को रोकने के लिए संहिता में एक उपयोगी प्रावधान यह है कि हिंदू द्वारा किए गए अभिग्रहण का पंजीकरण होना चाहिए।

अब प्रश्न अल्पवस्यका और संरक्षकता का आता है, जो कि इस विधेयक में संहिताबद्ध करने का अन्तिम विषय है। संहिता के इस भाग में कुछ नया नहीं है, अतः मैं जहां तक विधेययक में इस भाग का संबंध है, कुछ नहीं कहना चाहता।

जैसा कि सदस्य महसूस कर रहे होंगे, इस विधेयक से विचार करने के लिए जो मुद्दे उभरकर सामने आते हैं, और नये हैं, वे इस प्रकार हैंः पहला, जन्म-सिद्ध अधिकार और उत्तरजीविता द्वारा संपत्ति प्राप्त करने के अधिकार का उन्मूलन। विचार करने के लिए जो दूसरा मुद्दा आता है वह है पुत्रियों को आधा हिस्सा देना। तीसरा, महिला की सीमित भू-संपत्ति को पूर्ण भू-संपत्ति में परिवर्तित करना। चौथा, विवाह और अभिग्रहण (गोद लेने) के मामले में जाति की समाप्ति। पांचवा, एक पत्नी सिद्धांत और छठवां तलाक का सिद्धांत। मैंने इन बिन्दुओं से अलग-अलग और श्रेणीवार रखने का प्रयास किया है क्योंकि मैंने अनुभव किया है कि हमारे पास समय बहुत कम है, अतः यदि मैं