अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 339

324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बता सकूं कि वाद-विवाद के लिए कौन-कौन से मुद्दे हैं जिन पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है तो यह सभा के सदस्यों के लिए बहुत ही सहायक होगा। इस विधेयक में हम जिन मुद्दों से अलग हुए हैं निःसंदेह उन के साथ न्याय करने की आवश्यकता है। परन्तु मैं सोचता हूँ कि यदि मैं ऐसी स्थिति में विधेयक से अलग हुए अधिनियमों के बचाव में कुछ कहूं तो यह मात्र समय गंवाना होगा। अब मैं इन मुद्दों पर माननीय सदस्यों के विचार सुनना चाहता हूँ कि उनको क्या कहना है जिन्हें मैंने गिनाया है और यदि मैं यह उचित समझता हूँ कि मेरे लिए इनका स्पष्टीकरण करना आवश्यक है तो मैं अपने उत्तर में ऐसा करूंगा। महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँ।

माननीय अध्यक्षः प्रस्ताव है किः

फ्हिंदू कानून के कुछ उपबंधों में संशोधन करने और उन्हें संहिताबद्ध करने संबंधी विधेयक प्रवर समिति को भेजा जाए जिसमें श्री अलादी कृष्ण स्वामी अय्यर, डॉ. बख्शी टेकचन्द, श्री एम. अनन्त सायनम आयंगर, श्रीमती जी. दुर्गाबाई, श्री एल. कृष्णास्वामी भारती, श्री यू. श्रीनिवास मलैया, श्री मिहिर लाल चट्टोपाध्याय, डॉ. पी.एस. देशमुख, श्रीमती रेणुका रे, डॉ. पी.के. सेन, बाबू रामनारायण सिंह, श्री किशोरी मोहन त्रिपाठी, श्रीमती अम्मू स्वामीनाथन, पं. बालकृण्ण शर्मा, श्री खुर्शीदलाल, श्री ब्रजेश्वर प्रसाद, श्री बी. शिवाराव, श्री बलदेव स्वरूप, श्री वी.सी. केशव राव और प्रस्ताव प्रस्तुतकर्ता सदस्य होंगे। यह समिति विधानसभा को अगले सत्र के प्रथम सप्ताह के अन्तिम दिन से पूर्व रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी और समिति की बैठक की कार्यवाही चलाने के लिए सदस्यों की संख्या कम से कम 5 होगी।य्

डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैया (मद्रासः सामान्य)ः अध्यक्ष महोदय, मैं आपका ध्यान पहले इसलिए आकर्षित कर रहा हूँ ताकि मैं इस सभा का भी ध्यान आकर्षित कर सकूं। इस सभा में प्रस्तुत किया गया यह विधान बहुत ही रोचक है, यह ऐसा विधान है जिसकी प्रतीक्षा पूरा देश लम्बे समय से कर रहा था। यह देश, जो हजारों वर्षों तक विदेशी शासन के अधीन रहा, उन सामाजिक परिवर्तनों को प्रभावी नहीं कर पाया। परम्परा वह ताकत है जिनको सामान्यतः शासकों द्वारा संरक्षण दिया जाता रहा है, प्रशंसा की जाती है और मान्यता दी जाती है। दुर्भाग्य से, इस देश में लम्बे समय तक कोई ऐसा शासक नहीं रहा जिसकी प्रेरणादायक मिसाल से प्रजा सामाजिक परिवर्तनों को देख सके। पश्चिमी देशों में आज भी यदि किसी सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता होती है तो जो करना होता है, वह राजा के द्वारा उस परिवर्तन को प्रारम्भ करके किया जाता है और सभी लोग उसका अनुसरण करते हैं। आपने एडवर्ड-अष्टम की कहानी तो सुनी होगी जो, जब वह प्रिंस ऑफ वेल्स था, एक सुदूर द्वीप पर गया और लोगों से सुनने के बाद, कि उनका व्यवसाय फैशन परिवर्तन के कारण समाप्त हो गया, उसने पूछा कि वह कौन-सा फैशन था जिसने उनके व्यवसाय को नष्ट कर दिया। उन्होंने बताया कि पहले वे लोग घास की टोपी बनाते थे और अब घास की टोपियों का स्थान फेल्ट की टोपियों ने ले लिया है और इसीलिए उनका व्यवसाय समाप्त हो गया। दूसरे दिन वह