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समारोह में जनता के बीच एक घास की टोपी के साथ उपस्थित हुआ और एक बार पुनः घास की टोपियों का उद्योग पुनर्जीवित हो गया। राजा की शक्ति ऐसी होती है। वह अपने देश का केवल राजनीतिक अध्यक्ष ही नहीं होता बल्कि समाज का अध्यक्ष, आदर्श, परामर्शदाता और नायक होता है। वह वर्षों पुरानी, पारम्परिक और पुरातन परम्पराओं को, जिनको वर्षों से मान्यता मिली होती है, यह उसके शक्ति के अन्दर होता है कि एक या दूसरे तरीके से वह उसमें परिवर्तन कर सके, परन्तु जब से ब्रिटिश शासन आरम्भ हुआ है तब से हमारी नियति क्या रही है? जब तक मुसलमान शासक हमारे देश पर शासन कर रहे थे, तब तक हमने उनकी परम्पराओं का और उन्होंने हमारी परम्पराओं का पालन किया_ तब परम्पराएं मिश्रित भी हो गई थी और इस कारण से सामाजिक उन्नति भी हुई। परन्तु अंग्रेजों के आने के बाद, देश की बहुसंख्यक आबादी द्वारा जब उनको अछूत के रूप में देखा जाने लगा, तो ऐसी स्थिति हो गई कि वे यहां की परम्पराओं को दूर से भी अनुभव करने में भयभीत होते थे। उनको सामाजिक-धार्मिक ढांचे में हस्तक्षेप करने से डर लगता था जो कि रसायनिक सामंजस्य की भांति एक कोमल ढांचा था जो कि आनुषंगिक साधनों से तथा विदेशों से आने वाले छोटे-छोटे परिवर्तनों के अप्रत्यक्ष प्रभाव को सहन करता था। उनको यह भी भय था कि ऐसी प्रतिक्रियाएं इस देश में उनके साम्राज्य की स्थिरता के लिए खतरनाक होंगी। अतः उन्होंने इस भूमि की प्रथाओं या धर्म में हस्तक्षेप न करने वाला प्रशंसनीय और तर्कसंगत दिखती विचारधारा को स्वीकार किया। इस प्रकार से, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों ने प्रथाओं को मान्यता देकर, जैसे कि यह शताब्दियों से चल रहा हो, सहायता की और उन्होंने कभी भी समाज की उन्नति के रूप में प्रथाओं में कोई भी परिवर्तन स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार प्रथाएं अश्मीभूत हो गई और जब प्रथाएं अश्मीभूत हुई तो उन्नति में भी चौतरफा बाधाएं आईं और लगभग 150 वर्षों तक हमारे समाज की प्रगति नहीं हो पाई। यदि एक स्थिति में मिश्नरी सामाजिक बुराइयों के बारे में बात करते तो उनका उद्देश्य उत्तरोत्तर सहायता की भावना की अपेक्षा उनकी बुराई करना अधिक था। और जैसे-जैसे समय बीतता गया, और अंग्रेजी शिक्षा की जड़ें जमने लगीं और जैसे-जैसे प्रजातंत्र बढ़ता गया, और लोगों की भावना इस तरफ आकर्षित होने लगी, तभी दूसरा परिवर्तन हो गया। मिशनरी और धार्मिक व्यक्ति, जो शिक्षित भारतीयों को उनकी रूढि़वादी बेडि़यों से मुक्त करने के इच्छुक थे, अचानक इन परिवर्तनों के विरुद्ध और रूढि़वादी हो गए जिसे शिक्षित अंगे्रज व्यक्ति कुछ गैर-जिम्मेदारी के साथ स्वीकृत कर रहे थे। उन्होंने यह पता लगाना शुरू किया कि क्या ये लोग जो इन परिवर्तनों को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, का मतलब इन परिवर्तनों को स्वीकार करना ही था अथवा समाज की कठोर परम्पराओं को दूर फैंक करके तनावमुक्त होता था। वे इसको पसंद नहीं करते थे। क्योंकि सुधार की भावना सदैव उनकी अपनी शक्तियों का ही विनाश करती है। सुधारों को बढ़ावा देने में उन्होंने अपने शासन के प्रति खतरा पाया और मिशनरियों ने एकाएक पाया कि वे राष्ट्र में कुछ मात्रा में विद्रोह की भावना को बढ़ावा दे रहे हैं। अब इस देश को बचाने