अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 341

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के लिए ब्रह्मवाद की ओर देखा जा रहा था परन्तु मिशनरी ब्रह्मवाद की बुराई करते थे क्योंकि राष्ट्र की सुधारात्मक भावना को उन्होंने रोक दिया था। इस तरह मिशनरी स्वयं ही रूढि़वादी हो गए थे। अंग्रेज रूढि़वादी हो गये, प्रथाएं कठोर बन गईं, समाज एक कक्ष में अश्मीभूत, स्थिर हो गया जो न अधिक चौड़ा था न फैलने वाला। इस प्रकार हमने बहुत अधिक परेशानी उठाई है, इतना अधिक कि इसी कारण पंजाब के उच्च न्यायालय ने यौवनारम्भ के बाद विवाह को अवैध घोषित कर दिया। यह एक अन्तिम तिनका था जिसने प्रगतिशील समाज की कमर ही तोड़ दी। इसके तुरन्त बाद, विवाह कानून में सुधार का प्रयास करके प्रथाओं को भी नष्ट करने का प्रयास किया गया। 1870 के अधिनियम 3 को, जो ब्रह्म विवाह अधिनियम के नाम से सर्वाधिक लोकप्रिय है में कुछ अमान्य कथनों की आवश्यकता थी, फ्मैं इसका खंडन करता हूँ कि मैं एक हिंदू हूँ, अथवा मुसलमान हूँ, या ईसाई अथवा पारसी हूँ, जैन हूँ अथवा यहूदी हूँ।य् यह घोषणा उस अधिनियम के प्रावधानों के साथ संबद्ध थी। अतः यह लोकप्रिय नहीं हो पाई। बाद में शारदा अधिनियम आया। भाग्यवश सामाजिक सुधारों पर उसने अपने अधिकारों की मोहर लगा रखी थी जिसे रूढि़वादी शासक जबरदस्ती लागू कर, रास्ता रोक रही थी। एक नये युग का सूत्रपात हुआ। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, जो 1885 में स्थापित हुई थी, 1919 तक सामाजिक सुधारों की सहायक संस्था के रूप में संबद्ध रही, जिसने देश की सामाजिक बुराइयों की तरफ ध्यान दिया और कई वैधानिक उपाय करने के सुझाव भी दिए। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने उन विधायी परिवर्तनों को लागू करने में अपनी अनिच्छा व्यक्त की और समय बीतने के साथ-साथ समाज ने भी देश में विदेशियों के हाथों समाज सुधार के कार्य को स्वीकार करने के प्रस्ताव को नहीं माना।

महोदय, सौभाग्य से हम ऐसी परिस्थितियों से निकलकर बच गए हैं। मुझे प्रसन्नता है कि मैं उस युग को देखने के लिए जीवित हूँ। जिसमें राष्ट्रीय सरकार के प्रयास से सुधार के प्रगतिशील उपायों, जो देखने में व्यापक, दूरगामी परिणामों वाले हैं, जो उपचार करने वाले हैं को आगे लाया जा रहा है और जो उत्तराधिकार के मामले में, विवाह के संबंध में, संपत्ति के संबंध में, विवाह-विच्छेद के संबंध में और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संबंध में महिलाओं के अधिकारों को स्वीकार करता है। मैं आशा करता हूँ कि जैसे-जैसे समय बीतेगा इस दिशा में और अधिक सुधार होते जाएंगे जिसके लिए ये उपाय किये गये हैं।

अब मैं महिला के पति की मृत्यु के बाद उसको प्राप्त होने वाले अधिकारों के बारे में बात करता हूँ। हमारे शास्त्रों में यह संक्षेप में बताया गया है कि युवावस्था में महिला अपने पिता की, अधेड़ उम्र में अपने पति की और जब वह माँ होती है तो अपने पुत्र की बंधुआ गुलाम होती है। वास्तव में सभी सूक्तियां, सूत्र, कहावतें, सामान्योक्तियां आधे सत्य होते हैं। उनमें थोड़ी-बहुत सच्चाई होती है। हम कभी-कभी उदाहरण देकर इनका उपयोग करते हैं परन्तु उसमें कुछ असत्यता भी होती है फिर भी हमें इनके पूरे महत्व को समझने का प्रयास करना चाहिए।