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हमारे पास जो मानक हैं, उनके अनुसार एक महिला के पास उसके अपने अधिकार में संपत्ति होगी और वह उस संपत्ति को बेच सकेगी। मैं कानून मंत्री से यह जानने की कोशिश कर रहा हूँ कि ये अधिकार कब से प्रभावी होंगे। यह मानते हुए कि यह विधि स्वीकृत होने के बाद यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है और उसकी पत्नी संपत्ति प्राप्त करती है तो उसके अधिकार उस विधवा के अधिकारों की तुलना में क्या है जिसके पति की मृत्यु एक वर्ष पूर्व हो चुकी हो? एक वर्ष पूर्व पति की मृत्यु वाली महिला की सीमित संपत्ति होती है। इसमें क्या परिवर्तन किये जाने का प्रयास किया जा रहा है? क्या वे विधवाएं जिनके पास केवल सीमित भू-संपत्ति है अपनी संपत्ति को पूर्ण अधिकार वाली भू-संपत्ति में परिवर्तित कर सकती है जिसमें उनको किसी को देने, गिरवी रखने, बेचने आदि का अधिकार हो चाहे परिवार के हितों के लिए उसकी कोई कानूनी आवश्यकता हो या न हो? यह एक ऐसा विषय है जिसको मैं इन पृष्ठों को पलट कर समझने की कोशिश कर रहा हूँ परन्तु मैं अभी समझ नहीं पाया हूँ। मैं यह कहने का दुःसाहस करता हूँ कि विधेयक के प्रस्तुतकर्ता अपने उत्तर में इस विषय को अच्छी तरह स्पष्ट करेंगे।
पुत्री का अधिकार ऐसा विषय है जिस पर बोलने के लिए मैं बहुत उत्साहित हूँ। जब हम अंग्रेजों से बात करते हैं अथवा जब हम विदेशों से आए हुए विद्वानों और पंडितों से भारतीय समाज और अवस्थाओं के बारे में चर्चा करते हैं तो मैं अपनी परम्पराओं की प्रशंसा करने में कभी भी संकोच नहीं करता हूँ। यदि आप किसी परम्परा के आधार को समझने की इच्छा करते हैं अथवा किसी सामाजिक प्रथा अथवा व्यवहार की प्रंशसा करते हैं तो आपको इसे वर्तमान गिरी हुई परिस्थितियों के अनुसार नहीं लेना चाहिए बल्कि आपको इसकी पुरातन पवित्रता और वैभव के बारे में भी सोचना चाहिए। मैं बाल विवाह को एक अच्छी प्रथा के रूप में मानता हूँ क्योंकि हमारे पूर्वजों ने इस विचारधारा को जन्म दिन या तथा वे इसे विवाह करने के लिए औसत पुरुष और औसत महिला के लिए अच्छा मानते थे। ऐसा विवाह अच्छा होता है क्योंकि बच्चे को एक दूसरे परिवार में स्थापित होना पड़ता है और यह स्थापना ऐसे समय होनी चाहिए जब पौधा छोटा हो न कि जब पौधा बड़ा हो जाए। परन्तु तत्पश्चात्, इस विचारधारा में परिवर्तन आ गया। हम अब ऐसे युग में रह रहे हैं जब अविवाहित रहने में लोग अधिक प्रसन्न हैं और विवाह करने तथा बच्चे पैदा करने की अपेक्षा वे दूसरे की पत्नियों की आलोचना करते हैं। अतः हमारे आदर्श परिवर्तित हो गए हैं और इस प्रकार बाल विवाह का सिद्धांत हमारे लिए बाध्यकारी नहीं रह गया है। प्रत्येक को अपनी इच्छा के अनुसार अपना जीवन बिताने की आजादी है और समाज द्वारा हम पर कोई दायित्व लागू नहीं किया गया है तथा सामाजिक परिस्थितियां भी बदल गई हैं। इन परिस्थितियों के चलते हमें पूर्व परम्पराओं, प्रथाओं और घटनाओं का शिकार नहीं बनना चाहिए।