अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 344

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इस मामले में पत्नी की स्थिति बहुत ही चापलूसी भरी है। उसकी बहन का पुत्र आता है उसका भाई आता है। वह उनको एक अच्छा उपहार देना चाहती है। परन्तु पत्नी को 5 रुपये भी लेने के लिए पति की तरफ ताकना पड़ता है। अंततः पति की भी अपना मनोदशा होती है। वह अच्छी मनोदशा में अथवा खराब मनोदशा में हो सकता है। अतः पत्नी के पास अपनी कुछ संपत्ति होनी चाहिए। जिसे वह अपना कह सके। क्या आप चाहेंगे कि वह अपने कुछ आभूषणों को बेच दे। यह विचार तो काल्पनिक है। कोई भी महिला अपने पति की मृत्यु के बाद भी आभूषणों को नहीं बेचेगी। क्योंकि पति की मृत्यु के बाद वे आभूषण उसकी और उसके मृतक पति की एक्यता की निशानी होते हैं। मैं इसे समझता हूँ। मैंने कई महिलाओं से इस बारे में बात की है।

माननीय अध्यक्षः क्या माननीय सदस्य ज्यादा समय तक बोलना चाहते हैं?

डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैयाः क्षमा करें, मुझे समय की जानकारी नहीं थी। मैं अभी और कहना चाहता हूँ।

माननीय अध्यक्षः यह सभा आधे घंटे के लिए स्थगित की जाती है और साढ़े पांच बजे पुनः समवेत होगी।

तत्पश्चात् विधानसभा अपराह्न साढ़े पाँच बजे तक के लिए स्थगित हो गई।

विधानसभा साढ़े पांच बजे पुनः समवेत हुई।

[ माननीय अध्यक्ष (श्री जी.वी. मानलंकर) आसन पर ]

डॉ. बी. पट्टाभि सीतारमैयाः मैं पैतृक संपत्ति में पुत्री के हिस्से की बात कर रहा था। मुझे अपने महिला मित्रों से मजाक करने की आदत है और उनसे पूछता रहता हूँ कि फ्आप अपना हिस्सा क्यों चाहती हैं। आप किसी अन्य परिवार की शोभा बनने जा रही हैं। मेरी पत्नी मेरे घर की शोभा है और वह निःसंदेह परिवार की मुखिया है। उसके पास अपनी आलमारी की चाबी है और आपको भी किसी अन्य घर की चाबी मिलेगी।य् परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। पति की कृपा पर निर्भर होना पर्याप्त नहीं है चाहे जितना पति प्रिय हो। एक महिला का अपना अधिकार होना चाहिए और जब उसके पास अपना अधिकार होता है तो वह पति के द्वारा ज्यादा सम्मानित होती है और यद्यपि हमारे देश और समाज में युगों से महिला को खुद को तुच्छ समझने के सिद्धांत का अनुपालन हो रहा है। तथापि यह भी सही है कि आधुनिक युग में आत्मसम्मान की विचारधारा ने स्थिति को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया है। कोई यह तो कह सके कि महिला के पास अपने अधिकारों का उपयोग करने के लिए कुछ धन तो है।

यहाँ मुझे थोड़ी शंका है कि यदि पुत्रियाँ भी अपना हिस्सा लेने आती हैं तो क्या हम पुत्रों को उनके हिस्से से वंचित नहीं कर रहे हैं, जिसके लिए वे वैधानिक रूप से