अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 345

330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अधिकृत हैं। यह विधेयक जो हमारे सामने हैं, स्त्रीधन में पुत्रों के हिस्से को उस सीमा तक बताता है जहां तक पुत्रियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा दिया जाता है। यह चीजों को समान करती है और सभी माता-पिताओं को चेतावनी देती है कि उनके समान संख्या में पुत्र और पुत्रियां होनी चाहिएं। यही एक शर्त है जो हम पर लगाई गई है और यही हमारी अर्थव्यवस्था को संतुलित रखेगी। हमें अपनी संतानों को भी संतुलित रखना होगा।

परन्तु एक और कठिनाई है। अंततः परिस्थितियों के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि हम इसके पश्चात् विवाह निमंत्रणों के माध्यम से कुछ नहीं कह सकते कि मेरी पुत्री के विवाह में यह और यह चीजें दी जा रही हैं। इसके लिए एक अन्य नई भाषा का उपयोग होगा। मेरी पुत्री और फलां व्यक्ति आपस में विवाह करेंगे। यह नई भाषा है जो स्वीकार करना है। तब भी यह तथ्य होंगे कि मालदार क्षेत्र के अलावा जहां पति, पत्नियों के घर जाते हैं, यहां सामान्यतः हमारी पुत्रियां, पतियों के घर जाती हैं। निःसंदेह मालाबार क्षेत्र की स्थिति हमारी स्थिति से पूर्णरूप से विपरीत है और इस प्रश्न पर चर्चा करने में घंटों समय लगेगा। मैं इस मनोरंजक विषय पर नहीं जा रहा हूँ। फिर भी यह तथ्य है कि जब पुत्री अपने पिता के घर से दूर जाती है तो आश्चर्य तो है कि क्या वह संपत्ति का आनन्द ले सकेगी जिसको उसके माता-पिता ने दिया है। मैंने अपने मुसलमान भाइयों और बहनों से पूछा है कि क्या पुत्रियां उनको पुत्रों के आधे भाग का आधा हिस्सा दिये जाने की प्रथा का लाभ क्या वास्तव में उठाते हैं। उन्होंने कहा कि शहरों और कस्बों को छोड़कर इसका लाभ कहीं नहीं मिलता है। किसी न किसी तरह से भाई, बहन को परेशान करता रहता है तथा उसकी संपत्ति ले लेता है तथा उसे कुछ मुआवजा दे देता है। इस तरह हो या न हो परन्तु तथ्य यह है कि इसमें एक बड़ा खतरा है और इस मामले में सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब आप इस तथ्य को मान्यता देते हैं कि 80 % पट्टादार 2 ˝ एकड़ नम भूमि का अथवा 4-5 एकड़ शुष्क भूमि का केवल 10 रुपये कर के रूप में देता है तो उनको यहां पुत्री को हिस्सा देने का कहां अवसर है जो कि वह अपने साथ ले जा सके अथवा जिससे वह लाभ उठा सकें। व्यावहारिक दृष्टि से मुझे इसमें शंका है परन्तु सैद्धांतिक रूप से यह किसी भी कीमत पर बिना कोई प्रश्न किए निःसंदेह यह सही है।

जब आपने समाज में महिलाओं की स्थिति का प्रश्न उठाया है और जब आपने पूर्ण संपत्ति हासिल करने का अधिकार उसे दिया है तो आपको उसे कुछ विशेष अधिकार देने चाहिए। जिससे स्वाभाविक रूप से उसके अन्दर स्त्रियोचित आत्मसम्मान की भावना पैदा हो सके। विवाह की शर्तें दासता की शर्तें नहीं होतीं। यह कहना बिल्कुल ठीक है कि विवाह संबंध स्वर्ग में तय होते हैं और एक समय बना पति सदैव पति ही रहता है या एक समय बनी पत्नी सदैव पत्नी ही रहती है। यह बहुत अच्छा नियम है परन्तु उसी समय कुछ शर्तें भी होती हैं जैसेµशराब पीना, क्रूरता, पति का अनैतिक चरित्र, बीमारियां जैसेµकुष्ठ रोग, नपुसंकता और अन्य बहुत-सी शर्तें जिसका उल्लेख कानून मंत्री ने किया है जो पति-पत्नी