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हमारे पास आए हैंµमैं पाता हूं कि पश्चिम बंगाल में अभी भी सब एक ओर हैं। यह स्पष्टतः विधेयक के विरुद्ध है। जो उल्लेखनीय बात है, वह यह है कि बंगाल सरकार के विधि मंत्रालय के सचिव का भी इस संबंध में अभिमत है। ये अभिमत पत्र संख्या 4, संख्या 17 है। यह अभिमत विधेयक के विपरीत है। इसमें कहा गया है कि विधेयक को लाने का यह उचित समय नहीं है। ( एक माननीय सदस्यः फ्वह कब था।य्) इसमें कोई तिथि नहीं है। इसे अभी वर्तमान में ही अर्थात् 5-6 दिनों पहले परिचालित किया गया है। वास्तव में यह बताया गया है कि यह विधेयक दूरगामी महत्व वाला है और व्यक्त किए गए अभिमतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। यह सभा अब आपत्तियों की विभिन्न श्रेणियों पर विचार करेगी। एक आपत्ति यह है कि, यह विधेयक विभिन्न समुदायों से संबंधित विभिन्न विधायकों द्वारा विचार नहीं किया जाना चाहिए। यही कारण है कि मैं विशेष रूप से बोलने का इच्छुक हूँ क्योंकि यह भय है कि विभिन्न समुदायों के व्यक्ति विधेयक का समर्थन करेंगे और रूढि़वादी हिंदुओं के हितों को नष्ट कर देंगे। इसी कारण से मैंने जल्दबाजी में यह घोषणा कर दी कि मैं इस विधेयक का समर्थन नहीं करता हूँ क्योंकि हिंदू समुदाय इसके विरुद्ध है।
एक आपत्ति यह है कि महिलाओं की हिस्सेदारी शुरू करने से मुकदमे आने शुरू हो जायेंगे। इस संबंध में कई विचार हैं कि इससे विभाजन को बढ़ावा मिलेगा और अन्ततः इससे हिंदुओं में सयुक्त परिवार प्रथा का विघटन होगा। जिसने विभाजन के विनाशकारी प्रभाव से समुदाय को बचाया है और जिससे मुसलमान बहुत अधिक भयातुर रहते हैं। यह भी कहा गया है कि हिंदू कानून-वैदिक साहित्य और वैदिकोत्तर साहित्य जिसे श्रुति और स्मृति के रूप में जाना जाता हैµइसकी उत्पत्ति दैवीय है। परन्तु यह विधेयक कहा गया है, हिंदुओं की संरचना, धार्मिक आधार और धार्मिक ताने-बाने के प्रतिकूल है। यह वह आधार है जिसका काफी विरोध हो रहा है। यह तर्क दिया जाता है कि आप सभी धर्माचरण, धार्मिक साहित्यों में उतना विश्वास नहीं कर सकते जितना विश्वास अन्धविश्वासों पर करते हैं। उन्होंने हिंदू समाज को वर्षों तक जीवित रखा है यद्यपि वह बिल्कुल सत्य है कि समाज स्थिर नहीं रह सकता। इसे गतिमान होना चाहिए परन्तु इसे सावधानी से और अनुभव के साथ गतिमान होना चाहिए।
इस विधेयक में बहुत व्यापक परिवर्तन है। इन आपत्तियों में एक स्पष्ट मुद्दा यह है कि वर्तमान विधानमंडल केवल एक मुद्दे पर चुनकर आया था और वह था स्वतंत्रता की प्राप्ति। वर्तमान विधेयक, जो कि निश्चित रूप से व्यापक और उलझा हुआ है, और इसके सिद्धांत जनता के समक्ष अभी नहीं आए हैं अतः इस संबंध में उनके विचारों की प्रतीक्षा करना और संविधान को पारित करना तथा जनता के समक्ष चुनाव में इस मुद्दे को ले जाना बेहतर होगा। तब यह पता लगेगा कि क्या वास्तव में जनता भी ऐसा ही चाहती है। वास्तव में, यह कहा जाता है कि यह विधेयक उचित रूप से परिचालित नहीं