336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
किया गया है। कई संगठनों को इस पर विचार करने और इस पर विचार व्यक्त करने का कुछ दिन का ही और कुछ घंटों तक का ही समय मिला। ऐसी परिस्थितियों में यह तर्कसंगत है कि इस स्तर पर विधेयक पर विचार न किया जाए।
इस प्रश्न का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है। इस विधेयक को पूरे भारत में समान रूप से हिंदुओं पर लागू करने का प्रयास है। परन्तु यह बताया गया है कि समय कम होने के कारण यह समान रूप से लागू नहीं हो पाएगा। यह सर्वविदित है कि कृषि भूमि का संबंध इस सभा के अधिकारक्षेत्र से बाहर है। यह राज्य का विषय है। जो भी कानून हम पारित करेंगे उसका प्रभाव केवल गैर-कृषि भूमि पर होगा, फिर उसका जो अर्थ हो यह कथन भी निरर्थक है। इसकी परिभाषा काराधान की दृष्टि से आयकर अधिनियम में की गई है और यह विधेयक तथा अन्य अधिनियम इसी आधार पर बने हैं। कुछ ऐसी भूमि हो सकती है जो कृषि और गैर-कृषि योग्य भूमि के बीचे में हो। वास्तव में, इस अन्तर के अलावा, हमारी संपत्ति का एक बहुत बड़ा भाग-लगभग 80 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि है। अतः यह पूर्णतः स्पष्ट है कि राज्य ही इसके बारे में कार्य कर सकते हैं और वे अलग-अलग तरीकों से इस बारे में कार्य कर सकते हैं, कुछ राज्य ऐसे भी हैं जो इस संबंध में कोई कार्य नहीं करते। कुछ राज्यों को हमने देश में शामिल किया है। यद्यपि हिंदू कानून एक समान होना है और इसे समरूप बनाने का भी प्रयास हैµलोग विधान बना सकते हैं और नहीं भी बना सकते हैं और यदि वे विधान बनाते हैं वे अलग प्रावधान कर सकते हैं। वास्तव में प्रांतीय सरकारें और राज्य अधिकतर स्थानीय प्रथाओं और स्थानीय विचारों से ज्यादा निर्देशित होते हैं और मुझे विश्वास है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा के लिए ऐसा कानून पारित करना बहुत ही कठिन होगा जो कि राज्य की विचारधाराओं के विपरीत है। अतः इसका प्रभाव ऐसा होगा कि इस कानून के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास दो प्रकार की संपत्ति हैµजैसे कृषि योग्य भूमि और मकान अथवा भवनµतो एक संपत्ति पर गैर-कृषि योग्य भूमि का कानून लागू होगा तो दूसरे पर कृषि योग्य भूमि का कानून। जो भी कानून आप पारित करें, वह समान रूप से होना चाहिए और इस संबंध में राज्य सरकारों के अभिमतों को एकत्रित करना और व्यापक विधान पारित करने के लिए इस सभा को राज्य के न्यायाधिकार क्षेत्र में निर्णय देने के लिए उसकी सहमति लेना अधिक उचित होगा। जैसा कि हमने कुछ मामलों में किया है। यदि व्यापक होना और परिपूर्ण होना ही मुख्य उद्देश्य है तो, यह अच्छा होगा कि केन्द्रीय विधानमण्डल राज्यों की सहमति प्राप्त करे और इस संबंध में पूरे भारत में कार्य करे। इन मामलों में राज्यों से सहयोग मांगने के लिए उनसे बात करना ज्यादा उचित होगा। यही कुछ परेशानियां हैं। अब समय अधिक हो गया है और जैसा कि माननीय कानून मंत्री जी ने बताया है, इस विधेयक की कुछ मुख्य विशेषताओं पर बात करना संभव नहीं हो पायेगा, कुछ आपत्तियों पर भी, सीमा-क्षेत्र की बात को छोड़कर, चर्चा करना असंभव है। एक बात मुझे परेशान