अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 355

340 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परन्तु विवाह की कुछ शर्तों के बारे में एक-दो बातें हैं जिन पर मैं कुछ प्रस्ताव देना चाहती हूँ। हमें सपिण्ड विवाह और सपिण्ड की परिभाषा के संबंध में कुछ पुनः सोचने की आवश्यकता है। संहिता में दी गई परिभाषा से हम बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं। पुनः हम चाहेंगे कि वैध विवाह के लिए विवाह योग्य उम्र भी एक शर्त होनी चाहिए। हमारे पास शारदा अधिनियम भी है परन्तु यह संतोषजनक नहीं है। इससे भी लोग संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि इससे बाल-विवाह को रोकने में सहायता नहीं मिलती_ यह प्रभावशाली नहीं है। इसके लिए हम चाहते हैं कि कानून ज्यादा कठोर हो। यदि हम विवाह की उम्र 16 वर्ष चाहते हैं तो यह आवश्यक है कि वैध विवाह के लिए यह एक शर्त के रूप में शामिल किया जाए और मैं चाहती हूँ कि प्रवर समिति यह परिवर्तन करें।

अब तलाक के संबंध में, कुछ लोगों द्वारा विचार व्यक्त करने के बाद भी कुछ अधिक हासिल नहीं हुआ है। तथापि, एक बात है जिसे मैं प्रवर समिति के सदस्यों की सूचना में लाना चाहती हूँ और वह है परित्याग के लिए दिया गया समय। यदि कोई पुरुष या महिला पति/पत्नी का परित्याग करता है तो यह प्रावधान बनाया गया है कि वह 5 वर्षों बाद तलाक ले सकता है। संहिता में 5 वर्ष का समय दिया गया है। यहां तक कि ‘नारद स्मृति’ में भी एक संतान-विहीन महिला को 3 वर्ष प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया है। तीन वर्षों के बाद, वह पुनर्विवाह कर सकती है। तो यह विशेष उपबंध हम यहां क्यों नहीं लाते कि यदि एक स्त्री संतान विहीन है तो उसे 5 वर्ष प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि वह तीन वर्षों के बाद अपने पति से तलाक ले सकती है। यदि किसी स्त्री के बच्चे हैं तो उसके लिए 5 वर्ष का समय ठीक है परन्तु किसी संतान-विहीन स्त्री के लिए तीन वर्ष का समय ही पर्याप्त होगा।

संरक्षकता के संबंध में, इस संहिता द्वारा वर्तमान कानून में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है। पिता ही बच्चों का स्वाभाविक संरक्षक है। मां इस में नहीं आती। हम चाहते हैं कि माता भी पिता के साथ बच्चों की सह-संरक्षक हो।

अभिग्रहण (गोद लेना) के संबंध में, मैं समझती हूँ कि पूरा अध्याय ही हटा देना चाहिए। हमारा राज्य एक धर्मनिरपक्ष राज्य है। हम धर्मनिरपेक्ष राज्य होना चाहते हैं। हिंदू कानून में, अभिग्रहण धार्मिक कार्यों के लिए है। किसी धर्मनिरपेक्ष राज्य को ऐसा किसी धार्मिक-प्रथा के संबंध में ही क्यों कुछ करना चाहिए? हमारी चिन्ता का विषय है कि क्या अभिग्रहण को, जो कि धार्मिक कार्य के लिए है, राज्य द्वारा विरासत के उद्देश्य के लिए ही मान्यता मिलनी चाहिए। हम ऐसा नहीं चाहते। यदि किसी बच्चे का अभिग्रहण (गोद लेना) होता है चाहे वह बालिका हो या बालक, तो हम चाहते हैं कि पुत्रियों का भी अभिग्रहण होना चाहिएµयदि किसी बच्चे का अभिग्रहण धार्मिक कार्य के लिए नहीं हुआ है, बल्कि वास्तविक कार्य के लिए अर्थात् माता-पिता एक संतान चाहते हैं तो उस संतान को वही अधिकार मिलने चाहिए जो कि वास्तविक संतान को मिलते हैं। परन्तु