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यदि अभिग्रहण धार्मिक कार्यों के लिए होता है तो केवल इस स्थिति में मैं समझती हूँ कि अभिग्रहण को विरासत हेतु मान्यता नहीं मिलनी चाहिए।
ये कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे हैं जिन पर मैं चाहती हूँ कि प्रवर समिति विचार करे। हमारी पुरानी परम्पराओं के संबंध में सभी बातों की प्रशंसा करते हुए कम से कम मेरे माननीय मित्र डॉ. पट्टाभि ने बहुत लम्बे भाषण दिए हैं। हमने पुरानी बातों पर बहुत ध्यान दिया है। हमें भविष्य की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। हम जो कानून बना रहे हैं वह भविष्य की पीढि़यों के लिए हैं। यह हमारे लिए नहीं है परन्तु हमारे बाद आनेवाली पीढि़यों के लिए यह कानून लागू होगा। हमें भविष्य की परिस्थितियों को देखना है। अंततः परिस्थितियां ही कानून बनाती हैं। कानून समाज को प्रतिबिम्बित करता है। कानून उन परिस्थितियों को प्रतिबिम्बित करता है जिसमें लोग रहते हैं। हमें यह भी देखना है कि विवाह अथवा तलाक के संबंध में अथवा अन्य दूसरे विचारों के संबंध में भविष्य की पीढि़यां हमारी पूर्व धारणा से ग्रसित न हों। मैं आशा करता हूं कि प्रवर समिति इस पर विचार करेगी और ऐसा विधेयक तैयार करेगी जो आनेवाले हिंदू समाज के लिए बहुत बड़ा वरदान सिद्ध होगा।
श्री राम सहाय (ग्वालियर राज्य)ः अध्यक्ष महोदय, मुझे इस विधेयक के संबंध में विशेष रूप से कुछ नहीं कहना है। वर्तमान हिंदू समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए जिस तरह से इस विधेयक का प्रारूप तैयार किया है, मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ। परन्तु मैं इसमें एक-दो कमियाँ पाता हूँ और मैं इसे प्रवर समिति के विचारार्थ उनको स्पष्ट करना आवश्यक समझता हूँ।
इस विधेयक के भाग 4 के खंड 3(6) में कहा गया है कि अवयस्क बालिकाओं के संबंध में उनके संरक्षक से विवाह की सहमति अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। परन्तु जहाँ तक विवाह को अवैध घोषित करने का संबंध है, खंड 5 में बताया गया है कि यह केवल इस आधार पर अवैध नहीं समझा जाएगा कि संरक्षक की सहमति नहीं थी अथवा सहमति प्राप्त नहीं की गई थी। मैं यह समझने में असमर्थ हूँ कि इसे अवैध क्यों नहीं समझना चाहिए जब कि यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि संरक्षक ही सहमति अवश्य प्राप्त करनी चाहिए। यदि संरक्षक की सहमति बलात् अथवा गलत तरीके से प्राप्त की गई है तो भी विवाह को अवैध समझा जा सकता है और यदि सहमति बिलकुल ही प्राप्त नहीं की गई है तो विवाह को अवैध क्यों नहीं समझा जाना चाहिए इसके उलट यह लिखा गया है कि विवाह केवल इस कारण से अवैध नहीं होगा। यह एक कमी है जिस पर प्रवर समिति को विचार करना चाहिए।
मुझे दूसरी बात जो कहनी है वह उत्तराधिकार के संबंध में है और जिसके बारे में श्रीमती हंस मेहता ने अभी अभी भाषण में उल्लेख किया है। परन्तु मैं उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचारों से अक्षरशः सहमत नहीं हूँ और मेरा विचार है कि जिस