342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्रकार से उत्तराधिकार की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है उससे धर्मशास्त्र (हिंदू कानून संहिता) के मौलिक सिद्धांतों को अवहेलना होती है। मेरा मतलब यह नहीं है कि महिलाओं को काई अधिकार नहीं मिलने चाहिएं। मेरा विचार है कि उनको यहां पुरुषों से ज्यादा अधिकार दिए गए हैं। मैं बता सकता हूँ कि जहां पुत्री को अपनी पैतृक संपत्ति में से और अपने पति के परिवार की संपत्ति से हिस्सा मिलता है वहीं इस विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है जहां किसी पुरुष को अपनी पैतृक संपत्ति के अतिरिक्त अपने ससुर की संपत्ति से भी कुछ हिस्सा मिलता हो। इस प्रकार से, पुरुषों को उसी अन्याय का सामना करना पड़ रहा है जो अब तक महिलाओं पर होता रहा है। इसके विपरीत, यह भी कहा जा सकता है कि वह हिस्सा, जो पत्नी अपने पैतृक संपत्ति के रूप में प्राप्त करेगी, उसकी कमी को दूर करेगा। परन्तु विधेयक की विचारार्थ आपत्तियां और भौतिक परिस्थितियां जिससे इसकी आवश्यकता हुई, पर विचार करने के बाद यह महसूस किया गया है कि वास्तविक समस्या का समाधान नहीं हो पाया। इसका कारण यह है कि जो संपत्ति महिला अपने पैतृक रूप में प्राप्त करती है उसे उसका स्त्रीधन माना जाएगा और उसके पति पर उसका कोई अधिकार नहीं होगा और इसलिए उसे इस संपत्ति से कोई विशेष लाभ प्राप्त नहीं होगा। इस प्रकार मैंने प्रवर समिति के विचार हेतु दूसरी बात का निवेदन किया है जो कि बहुत आवश्यक है।
मुझे एक बात और कहनी है। धर्मशास्त्र के सिद्धांतों और वर्तमान स्थिति में जो कुछ अन्तर हो, मैं समझता हूँ कि हमें उनमें प्रतिपादित मौलिक सिद्धांतों का ही अनुसरण करना चाहिए और इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए हमें सभी बातों पर निर्णय लेना चाहिए। हमें केवल वही परिवर्तन करने चाहिए जो कि वर्तमान परिस्थितियों और समाज की स्थिति के अनुसार आवश्यक हों। हमें कोई परिवर्तन मात्र उत्तेजनावश अथवा पश्चिमी सभ्यता की नकल करके नहीं करना चाहिए जो हमारे समाज की प्रगति में बाधा उत्पन्न करे और कठिनाइयां पैदा करें जो कि वांछनीय न हो।
अतः मैं प्रवर के सदस्यों से निवेदन करूंगा कि वे इन सब बातों पर विचार करें और आवश्यक संशोधन करने का प्रयास करें।
डॉ. बी.बी. केस्कर (यू.पी.ः सामान्य)ः महोदय मैं माननीय कानून मंत्री जी को काफी विलम्ब होने के बाद भी, इस विधेयक को लाने के लिए बधाई देना चाहता हूँ। महोदय, निःसंदेह एक बहुत महत्वपूर्ण विधेयक है। जैसा कि, मेरे माननीय मित्र डा. पट्टाभि ने कहा, मैं नहीं समझता कि कभी इतना मौलिक और क्रान्तिकारी विधेयक आया हो जो कि हिंदू समाज के मूल आधारों में ही परिवर्तन करने का प्रयास कर रहा हो, एक ऐसा समाज जो कि गत हजारों वर्षों से जीवाश्म के रूप में बच रहा हो। निःसंदेह ऐसा ही है और मैं इस सभा का और प्रवर समिति के सदस्यों का ध्यान इस तथ्य की