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ओर दिलाना चाहता हूँ कि यह समाज पिछले हजारों वर्षों से जीवाश्म के रूप में रहा है और इसके राजनीतिक ढांचे पर इनकी अकर्मण्यता और आलस्यपन छा गया है कि सभी तरीके और सभी प्रकार की शक्तियां इस विधेयक का अवरोध करने सामने आएगा ताकि हिंदू समाज के वर्तमान ढांचे में परिवर्तन से संबंधित किसी भी विधेयक को पारित करने में अवरोध उत्पन्न करेंगी। यह हिंदू समाज की अकर्मण्यता और आलस्य है जो सभवतः इसके लिए श्राप बन गया है कि प्रवर समिति के सदस्य और माननीय कानून मंत्री जी को इस पर ध्यान देना होगा क्योंकि मुझे शंका है कि जब तक यह विधेयक पारित नहीं हो जाता है, उस अन्तिम समय तक हर तरह से प्रयास किया जाएगा कि यह विधेयक कानून न बन पाये। इनमें जिन परिवर्तनों का सुझाव दिया गया है वे हिंदू कानून में मौलिक परिवर्तन है। मैं जानता हूँ कि रूढि़वादी लोग हर तरह से प्रयास करेंगे। मेरे माननीय मित्र नजीरुद्दीन अहमद ने अच्छी तरह से विधेयक के क्रान्तिकारी स्वभाव के बारे में रूढि़वादी समाज के कुछ वर्ग के लोगों की चेतावनी की ओर ध्यान दिलाया है। कुछ ऐसे परिवर्तनों का सुझाव दिया गया है जो निःसंदेह क्रान्तिकारी प्रतीत होते हैं। परन्तु डॉ. पट्टाभि ने ठीक कहा है कि ये परिवर्तन वास्तव में क्रांतिकारी नहीं हैं। ऐसा इसलिए है कि पिछली कई शताब्दियों से हिंदू समाज को विकास नहीं करने दिया गया। अतः हमें कुछ दिनों में शताब्दियों पुरानी परम्पराओं में परिवर्तन करना। अतः मैं प्रवर समिति के सदस्यों से कहूंगा कि वे तथाकथित रूढि़वादी विचारधारा के दबाव का शिकार न बने जो वास्तव में कई शताब्दियों की अकर्मण्यता का प्रतीक है तथा कोई परिवर्तन नहीं चाहता है, परन्तु वर्षों तक इस पर सोच-विचार करने के बाद भी इस निष्कर्ष पर पहुंचा गया है कि कोई परिवर्तन हिंदू धर्म पर आक्रमण के समान है। मैं उनसे कहूंगा कि वे इसकी रक्षा करें और सभी दबावों के बावजूद भी आगे बढ़ते रहें।
हिंदू कानून के किसी मौलिक परिवर्तन के प्रश्न को छोड़कर निःसंदेह हिंदू कानून को सुदृढ़ करने की तत्काल आवश्यकता है। महोदय हिंदू कानून वर्तमान समय में एक भूल-भुलैया है। यह सुन्दरवन और तराई के जंगलों की भांति है जिसमें सभी प्रकार का व्यवहार और परम्पराएं चलती रहती हैं। जिसमें वे सभी पौराणिक पुस्तकें और जिनमें भारत के कई भाग की, कई क्षेत्रों और राज्यों के रीति-रिवाज हैं जिनमें बहुत-सी जातियां, उप-जातियां, उप-जातियां हैं और जो कि वकीलों के लिए स्वाभाविक रूप से एक स्वर्ग है। इसे किसी सीमा तक वांछनीय नहीं होना चाहिए था। परन्तु यह इस सीमा तक बढ़ गया है कि अब इसका समय आ गया है कि परम्पराओं और प्रतिपरम्पराओं की भूल-भुलैया खत्म हो और हमें इस कानून को तर्कसंगत और मजबूत बनाना चाहिए। यह हिंदू कानून में परिवर्तन के प्रश्न के अतिरिक्त है। अतः दोनों दृष्टियों से मैं समझता हूँ कि इस विधेयक में काफी विलम्ब हो गया है।