344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैं प्रवर समिति के सदस्यों को सावधान करना चाहता हूं कि अब इस विधेयक में अधिक विलम्ब नहीं करना चाहिए। 1944 में पहले ही यह समिति बन चुकी थी। इस विधेयक के संबंध में कुछ प्रस्ताव और विचार पिछले कई वर्षों से परिचालित किए जा रहे हैं और अभी भी इस विधेयक के संबंध में हमारे सामने कुछ प्रस्ताव है जो परिचालित होंगे। अब मैं चाहता हूं कि चर्चा के समय को जितना संभव हो सके कम किया जाए और इस विधेयक को सभा के समक्ष शीघ्रताशीघ्र अगले सत्र से पहले लाया जाए। महोदय मैं इस विधेयक का स्वागत करता हूँ।
बेगम ऐजाज रसूल (यू.पी.ः मुसलमान)ः महोदय, मैं इस सभा का ज्यादा समय नहीं लेना चाहती क्योंकि मैं जानती हूँ कि समय बहुत कम हैं, परतु मैं समझती हूँ कि यदि मैं माननीय कानून मंत्री द्वारा सभा के समक्ष लाए गए उपायों का स्वागत करने के लिए
खड़ी नहीं होती हूँ तो मैं अपने कर्तव्य से अलग हो रही हूँ। यह उचित ही है कि देश में स्वाधीनता प्राप्त होने से और राष्ट्रीय सरकार की स्थापना होने से इस सभा के समक्ष इस प्रकार के उपाय लाए गए हैं। मैं कवेल यही आशा कर सकती हूँ कि प्रवर समिति अपना प्रतिवेदन देने में विलम्ब नहीं करेगी और इस सभा को इन उपाय को पारित कानून बनाने में और इसे सांविधिक पुस्तक में शीघ्रतिशीघ्र रखने का अवसर प्राप्त होगा।
महादेय, निःसंदेह इस विधेयक के उपबंध बहुत ही दूरगामी हैं और निकाह, तलाक, विरासत तथा दत्तकग्रहण से संबंधित प्रावधान जो कि सामने लाए जा रहे हैं, निश्चित रूप से मौलिक उपाय हैं। यह बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दा है और हिंदू कानून का संहिताबद्ध होना विधान में एक यादगार हिस्से के रूप में देखा जाएगा। जो कि इस सभा के समक्ष कभी न लाया गया होगा।
महोदय, मैं इस विधेयक के विभिन्न खंडों पर चर्चा किए बिना ही, इन उपायों का समर्थन करती हूँ। महोदय, देश में महिलाओं की जो स्थिति है उससे देश के समाज को देखा जाता है और निःसंदेह ही भारत में हिंदू महिलाएं बहुत पीछे हैं। इस मामले में मुसलमान महिलाएं भाग्यशाली हैं कि शरियत कानून के अनुसार उनको बहुत अधिकार मिले हुए हैं। मैं अपने माननीय मित्र डॉ. पट्टाभि से पूर्णतः सहमत हूँ जब उन्होंने कहा कि यद्यपि शरियत के माध्यम से बहुत अधिक अधिकार मिले हुए हैं परन्तु वास्तविक रूप से उनका अनुपालन नहीं किया जा रहा है और मैं जानती हूँ कि आज भी भारत में बहुत से ऐसे भाग हैं जहां इस तथ्य के बावजूद कि मुस्लिम महिलाएं शरियत के द्वारा प्राप्त अपने अधिकारों का लाभ उठा रही हैं, उनका भी वास्तविक रूप में अनुपालन नहीं हो रहा है। पंजाब में पारम्परिक कानून अभी भी चल रहे हैं और पुत्रियों को पिता की संपत्ति से पूर्णतः बेदखल कर दिया जाता है। उसी प्रकार से, उत्तर प्रदेश में, कुछ भागों में यद्यपि शरियत के कानन चल रहे हैं, फिर भी मुस्लिम महिलाएं तालुकदारों के मध्य