अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 364

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है। महोदय, कृषि संपत्ति को न शामिल किए जाने के दो स्पष्टीकरण हैं। मेरे माननीय मित्र, यदि वे भारत सरकार अधिनियम की अनुसूचियों का संदर्भ लें, जहां पर राज्यों और केन्द्र के विधान बनाने का विषय दिया हुआ है, तो पायेंगे कि भूमि को फ्राज्यसूचीय् में रखा गया है। संघीय न्यायालय द्वारा न्यायिक व्याख्या दिए जाने के परिणामस्वरूप यह पाया गया है कि ‘भमि’ शब्द अथवा ‘भूमि’ विषय, जो कि ‘राज्य सूची’ में शामिल है, केवल काश्तकारी भूमि को ही नहीं सम्मिलित करता है बल्कि भूमि के उत्तराधिकार को भी सम्मिलित करता है और इसके परिणास्वरूप केन्द्र सरकार द्वारा भूमि के उत्तराधिकार के संबंध में बनाया गया कोई भी विधान उसके अधिकार-क्षेत्र से बाहर होगा। ऐसा न होने देने के लिए, समिति ने जानबूझकर कृषि भूमि को इस विधेयक के उपबंधों से अलग कर दिया। परन्तु मैं जो कुछ कहना चाहता हूँ वह कुछ अलग है। मुझे बताना चाहिए था कि इस विधेयक से भूमि का छूट जाना, इस विधेयक में चाहे कोई कमी हो अथवा गलती हो, शायद एक प्रकार से लाभकारी ही रहा क्योंकि मैं विश्वास करता हूँ कि उत्तराधिकार का एक समान कानून सभी प्रकार की संपत्तियों पर लागू हो, यह आवश्यक नहीं है। संपत्ति स्वभाव के अनुसार अलग-अलग होती है, समुदाय के सामाजिक जीवन में इसके महत्व के अनुसार भी भिन्न होती है और परिणामतः समाज के लाभ हेतु कृषि के लिए उत्तराधिकार का पृथक कानून और गैर-कृषि संपत्ति के लिए अलग कानून होना कोई उपयोगी बात नहीं है। स्थिति की अच्छी तरह समीक्षा करके भारतीय अथवा हिंदू समाज इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भूमि, जो कि उसके आर्थिक जीवन की धुरी है, आदिम अवस्था के कानून द्वारा बेहतर संचालित हो जिससे कि न तो कनिष्ठ पुत्र और न ही स्त्रियां उत्तराधिकार में हिस्सा ले सकें। जैसा कि मैंने कहा था कि, जो प्रश्न खुला छोड़ा जा चुका है, वह समाज के लाभ के लिए है कि वह मामले को नये सिरे से आरम्भ किया जाए। अतः, मैं नहीं समझता कि इस विधेयक के किसी भाग पर मेरे मित्र द्वारा की गई टिप्पणी से कोई क्षमा मांगने का मामला बनता है।

अब मै अपने मित्र श्री चौधरी की बातों की तरफ आता हूँ। वे सोचते हैं कि ये कानून एक साम्प्रदायिक कानून है। मैं इस बात से उतना ही सहमत हूँ कि इसमें हिंदू समाज का उल्लेख है जो कि इस देश में रहने वाले विभिन्न समुदायों में से एक है, इस कारण से इसे साम्प्रदायिक कहना ज्यादा तर्कसंगत होगा। परन्तु, इसका और विकल्प क्या है? यदि मेरे माननीय मित्र का विकल्प था कि उत्तराधिकार के लिए और विवाह के साम्प्रदायिक कानूनों का साम्प्रदायिक विधान नहीं होना चाहिए बल्कि एक-समान नागरिक संहिता होनी चाहिए जो सभी समुदायों, सभी वर्गों सभी व्यक्तियों पर लागू करते हुए_ वास्तव में, धर्म, पंथ, जाति के अनुसार विभेद किए बिना यदि यह सभी नागरिकों पर लागू करते हुए तो निश्चित रूप से मैं उनके साथ हूँ। उनका निश्चितरूप से यह निष्कर्ष नहीं है। जहां तक मैं उनको समझ पाया हूँ, उनका निष्कर्ष है कि इस विधान को, इस तथ्य के कारण कि अगले दिन यह विचार व्यक्त किया गया था, कि यहां बताया गया भविष्य