अनुभाग एक हिंदू संहिता विधेयक को प्रवर समिति को सौंपा जाना (17 नवम्बर, 1948 से 9 अप्रैल, 1948 तक) - Page 365

350 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का समाज जिसे यहां कहा गया धर्म निरपेक्ष होगा, के पास एक धर्म-निरपेक्ष समुदाय के लिए कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं थाः यह बहुत ही विनाशकारी निष्कर्ष है। इस देश में वे ही बहुत सारे समुदाय के लोग रहते हैं। प्रत्येक समुदाय के अपने विशेष कानून हैं और केवल इस कारण से, कि राज्य को धर्मनिरपेक्ष स्वभाव अपनाना है, इसे विभिन्न समुदायों के जीवन को संचालित करने से खुद को अलग कर लेना से निःसंदेह कोई परिणाम नहीं निकलेगा बलिक अराजकता और उन्मादकता ही फैलेगी। मैं स्वयं भी निश्चित रूप से इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार करने हेतु तैयार नहीं हूँ।

उन्होंने दूसरी टिप्पणी की थी कि इस विधेयक में पारम्परिक विधियों पर विचार नहीं किया गया है। उन्होंने प्रिवी कौंसिल के कुछ नियमों का हवाला दिया है। मुझे यह बताना चाहिए था कि आज के दिन प्रिवी कौंसिल के अधिकार को उद्घृत करना अनावश्यक है क्योंकि काफी समय पहले के निर्णयों से यह सिद्ध हो गया है कि जहां तक हिंदुओं का संबंध है, परम्पराएं स्मृति को प्रत्योदेशित करती रहेंगी। हम सब यह जानते हैं। परन्तु हम क्या कर रहे हैं। हम जो कुछ कर रहे हैं वह यह हैµहम नई प्रथाओं के विकास को समाप्त कर रहे हैं। हम वर्तमान परम्पराओं को नष्ट नहीं कर रहे हैं। विद्यमान परम्पराओं को हम स्वीकृत कर रहे हैं क्योंकि हिंदू समाज में जो कानून चल रहे हैं वे परम्पराओं के कारण ही चल रहे हैं। उनका जन्म ही प्रथाओं से हुआ है और हम महसूस करते हैं कि वे इतने मजबूती के साथ विकसित हुए हैं कि हम उनको अपने विधान के माध्यम से उनके राजनीतिक ढांचे को नया जीवन दे सकते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि हमने आदिवासी लोगों का विचार नहीं किया जिनका जीवन निःसंदेह अधिकतर परम्पराओं के माध्यम से चल रहा है। यदि मरे मित्र ने इस संहिता की परिभाषाओं को पढ़ा होता कि कौन हिंदू है और कौन नहीं है और किस पर यह कानून लागू होता है तो उन्होंने देखा होता कि इसमें एक ऐसी धारा है जिसमें कहा गया है कि वे व्यक्ति जो मुसलमान, पारसी अथवा ईसाई नहीं हैं, उनको हिंदू माना जाएगा। इसीलिए नहीं कि वे हिंदू हैं। उसका परिणाम यह हुआ कि यदि एक आदिवासी व्यक्ति कहना चाहता है कि वह हिंदू नहीं है तो इस संहिता के अन्तर्गत उसे अपने तर्क के समर्थन में यह साक्ष्य देने क लिए खुला अवसर मिलेगा कि वह हिंदू नहीं है और उसके निष्कर्ष को न्यायालय स्वीकार कर लेती है तो वह इस विधेयक में अन्तर्दिष्ट किसी भी प्रावधान के लिए अनुगृहीत नहीं रहेगा।

श्री रोहिणी कुमार चौधरीः मेरा मुद्दा यह है कि वह हिंदू नहीं कहलाना चाहता और हिंदू की सारी प्रथाओं को रखे रखना चाहता है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इस संबंध में स्थिति इस प्रकार हैµएक बार यदि कोई व्यक्ति अपने आपको हिंदू कहलवाना चाहता है तो उसे हिंदुओं के लिए