22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मैं उसके पीछे जाने के लिए बाध्य नहीं हूँ। ऐसी परिस्थितियों में मैं माननीय सदस्य से यह जानना चाहूँगा कि इन तर्कों को उठाने का उद्देश्य क्या है। जैसे कि कुछ समय पहले मैं समझा हूँ कि यह केवल सदन के लिए है। उसे व्यापक प्रचार के लिए स्वीकार कर लिया जाए। इस पृष्ठभूमि में कि प्रवर समिति ने इस विधेयक का मूल मसौदा नहीं देखा था, परन्तु दूसरा देखा था और दोनों ही मसौदे सदन के समक्ष विचाराधीन थे। इसलिए यह व्यवस्था का प्रश्न नहीं है परन्तु सदन को उस पर ध्यान देने का उद्देश्य है। जिसे मैं समझ सकता हूँ। इसके लिए ‘में की संसदीय व्यवहार’ और अन्य आदेशों को देखने की आवश्यकता नहीं है? जहां तक कानून का संबंध है, उस बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है और अब मैं माननीय सदस्य से यह निवेदन करना चाहूँगा, यदि संभव हो, तो वह अपने भाषण का निष्कर्ष निकालें और अन्य किसी विषय पर अपना भाषण करें।
श्री आर.के. सिधवा (सी.पी. और बिरारः सामान्य)ः श्रीमान, पूर्व वक्ता पंडित ठाकुर दास भार्गव ने कहा है कि अध्यक्ष का आदेश अन्तिम नहीं है। श्रीमान, क्या मैं आपका ध्यान आकर्षित कर सकता हूँख्...,
माननीय उपाध्यक्षः इस विषय में मैं कोई अन्य बहस नहीं चाहता। मैं पहले ही अपना आदेश दे चुका हूँ कि जहां तक इस कार्रवाई का संबंध है, अध्यक्ष का आदेश अंतिम है। इस विवाद में अनुमति नहीं दे सकता कि कोई उसे प्रश्नगत करे। यह अनावश्यक है कि तर्कों को सुदृढ़ किया जाए अथवा मुझे मजबूत किया जाए।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः श्रीमान, यह मेरे मस्तिष्क में दूर-दूर तक नहीं है कि मैं आपको आमंत्रित करूं कि अध्यक्ष के आदेश के विरोध में कोई आदेश/प्रति आदेश दिया जाए। मैं आपसे ऐसा करने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मैं भली-भांति समझ सकता हूँ कि यह वांछनीय नहीं है कि उस आदेश की समीक्षा की जाए जिसे उसी मामले में दिया जाता है, यद्यपि मैं यह जानता हूँ कि कानून के अनुसार आप पूर्ण रूप से सक्षम हैं कि आप दूसरा आदेश दें। कानून इतना संकरा नहीं है कि वह ऐसे मामलों में जिसमें अन्याय का बढ़ावा हो, व्यवस्था न कर सके। अतः मैं इस पर अधिक नहीं बोलूँगा कि अध्यक्ष के आदेश पर पुनः विचार किया जा सकता है। मैं जो निवेदन कर रहा है वह यह कि सदन के समक्ष अनेक प्रस्ताव हैं और क्योंकि यही व्यापक प्रचार के लिए अकेला नहीं है। यही विधेयक प्रवर समिति के समक्ष पुनः भेजा जा सकता है और वहां से पन्द्रह दिनों में वापस आ सकता है। जैसे कि मैंने पहले भी यह निवेदन किया था कि यह मामला विलंबकारी रणनीति का नहीं है। वह सब जो मैं चाहता हूँ कि सदन को ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जो कानून के अनुसार हो तथा जो सैद्धान्तिक रूप से सही हो। मैं इस सदन का एक सदस्य हूँ और इस प्रकार मुझे यह देखने का अधिकार है कि विधेयक जो प्रवर समिति को भेजा जाए, उस पर उसी तरह विचार-विनिमय हुआ है जैसी कि कानूनन आवश्यकता है। इसमें किसी बचाव की गुंजाइश नहीं है, अतः उसी