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(9)
किसी धार्मिक विवाह की औपचरिकताएँ
(9) धर्मांनुष्ठानः
(1) एक धार्मिक विवाह पूर्ण और किसी भी पक्ष पर बाध्यकारी नहीं होगा जब तक
कि वह किसी भी पक्ष की उन धार्मिक परम्पराओं और अनुष्ठानों के अनुरूप न
हो जो कि ऐसे विवाह के लिए आवश्यक है।
(2) जब ऐसे धार्मिक कृत्यों और अनुष्ठानों में सप्तपदी (अर्थात् पवित्र अग्नि के समक्ष
दुल्हा-दुल्हन द्वारा संयुक्त रूप से सात फेरे लिए जाते हैं) शामिल होती है तो ये
विवाह सातवां फेरा पड़ने के बाद पूर्ण और बाध्यकारी हो जाते हैं।
(3) इस खंड में अन्तर्विष्ट किन्हीं प्रावधानों के होते हुए भी धार्मिक विधि से हुआ
कोई विवाह किसी पक्ष द्वारा किसी धार्मिक परम्पराओं और अनुष्ठानों के निष्पादन
में हुई किसी अनियमितता के कारण अवैध नहीं समझा जायेगा।
(10)
(10) धार्मिक विवाह का पंजीयनः
(1) किसी धार्मिक विवाह के प्रमाण को प्राप्त करने के उद्देश्य से, राज्य सरकार
नियमानुसार निम्नलिखित माँग कर सकती हैµ
(क) ऐसे विवाहों से संबंधित विवरण इस उद्देश्य के लिए रखे गए रजिस्टर में
इस प्रकार और ऐसी परिस्थितियों के अन्तर्गत प्रविष्ट किए जायेंगे जो हिंदू
धार्मिक विवाह की रीति से उचित होंगे_ और
(ख) राज्य में अथवा ऐसे क्षेत्रों में अथवा ऐसे मामलों में जैसा कि नियमों में
विर्निष्टि है, इस प्रकार की प्रविष्टियों का किया जाना आवश्यक होगा।
(2) उपखंड (1) के अन्तर्गत किसी नियम के बनाते समय राज्य सरकार यह प्रावधान
करेगी कि इनका उल्लंघन होने पर जुर्माना लगाया जायेगा जो कि 100 रुपये तक
हो सकता है।