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(16) आपत्ति तर्कसंगत न पाए जाने की स्थिति में न्यायालय को जुर्माना लगाने का अधिकारः यदि न्यायालय को, जिसके समक्ष मुकदमा दायर किया गया है, यह प्रतीत होता है कि आपत्ति तर्कसंगत और प्रामणिक नहीं है तो वह आपत्ति करने वाले व्यक्ति पर एक हजार रुपये तक जुर्माना लगा सकता है और विवाह करने वाले दूसरे पक्ष को इस जुर्माने की राशि अथवा उसका कोई भी भाग दे सकता है।
(17) पक्षों और साक्षियों द्वारा घोषणाः
(1) विवाह होने से पहले दोनों पक्षों और तीन गवाहों को पंजीयक के समक्ष पांचवी
अनुसूची में दिये गए फार्म में एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करना पड़ेगा और जहां
पर यदि किसी पक्ष ने 21 वर्ष की अवस्था पूरी नहीं की है वहां पर, विधवा के
मामले को छोड़कर, उनके संरक्षकों द्वारा हस्ताक्षर किया जायेगा।
(2) उपखंड 1 में दी गई प्रत्येक घोषणा पर पंजीयक प्रति हस्ताक्षर करेगा।
(18) विवाह संपन्न होने की विधि और स्थानः
(1) विवाह निम्नलिखित स्थानों पर संपन्न कराया जा सकता हैः
(क) पंजीयक के कार्यालय में_ अथवा
(ख) समुचित दूरी के किसी अन्य स्थान पर, जहां पर पार्टियां चाहती हों और ऐसी
शर्तों पर तथा तय किए गए किसी निश्चित अतिरिक्त शुक्ल के भुगतान पर।
(2) विवाह किसी भी विधि से संपन्न कराया जा सकता है_ इन सब के होते हुए भी
यह तब तक पूर्ण और दोनों पक्षों पर बाध्यकारी नहीं होगा जब तक कि प्रत्येक
पक्ष पंजीयक और तीनों गवाहों की उपस्थिति में एक-दूसरे से यह नहीं कहता है
कि, मैं (क) तुमको (ख) विधि अनुसार अपनी पत्नी/पति स्वीकार करता हूँ।
(3) ऐसा विवाह पंजीयक और तीनों गवाहों की उपस्थिति में संपन्न होगा।
(19) विवाह का प्रमाण-पत्रः
(1) विवाह संपन्न हो जाने पर पंजीयक पुस्तिका की छठवीं अनुसूची में दिये गये फार्म
के अनुसार जो कि ‘इस उद्देश्य के लिए रखी जाती है और जिसे फ्पंजीकृत विवाह
प्रमाण-पत्र पुस्तिकाय् कहते हैं, प्रमाण-पत्र की प्रविष्टि करेगा और यह प्रमाण-पत्र
विवाह के दोनों पक्षों द्वारा तथा तीनों साक्षियों द्वारा हस्ताक्षरित होगा।
(2) पंजीयक द्वारा हिंदू पंजीकृत विवाह प्रमाण-पत्र पुस्तिका में प्रविष्टि कर दिये जाने
के बाद, प्रमाण-पत्र इस तथ्य का निर्णायक प्रमाण-पत्र होगा कि पंजीकृत विवाह