हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 39

24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

खंड, शब्द प्रति शब्द विचार करना था। केवल यही बात नहीं है। जिस प्रकार सदन बाध्य है, उसी प्रकार प्रवर समिति इस विधेयक खंड प्रति खंड और शब्द प्रति शब्द पर विचार करने के लिए बाध्य है।

माननीय उपाध्यक्षः हम यह मान कर चलेंगे कि इस आदेश के तहत मूल विधेयक और संशोधित मसौदा दोनों ही प्रस्तुत किये गये थे और सदस्यों ने इस पर खंड प्रति खंड विचार किया था। इसके बाद की स्थिति क्या है? क्या यह प्रश्न है कि हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिए और क्या यह सदन इस विचार करने के लिए सक्षम नहीं है? यदि ऐसा है तो इस बारे में पहले ही आदेश दिया जा चुका है। जब एक बार उस पर आदेश दिया जा चुका है, तो कैसे उसे पुनः विचार करने के लिए खोला जा सकता है?

पंडित ठाकुर दास भार्गवः प्राप्त तथ्यों के प्रश्न पर मैं फिर भी प्रवर समिति के सदस्यों से निवेदन करूंगा कि वे कृपा करके सदन को बताएं कि क्या ये दोनों विधेयक लिए गए थे और एक साथ विचार किया गया था। मान लिया जाये कि यह तथ्य सही है तो मेरा अभिप्राय यह है कि जब तक मूल विधेयक के प्रत्येक खंड पर विचार नहीं किया जाता और जब तक विधेयक के एक वाक्यांश के बाद दूसरे खंड और जब तक वह खंड प्रति खंड और शब्द प्रति शब्द विचार नहीं किया जाता, कानून और प्रक्रिया की आवश्यकता का अनुपालन नहीं किया गया है।

श्री एच.वी. कामथ (सी.पी. और बरारः सामान्य)ः क्या अध्यक्ष महोदय द्वारा प्रवर समिति की सक्षमता के प्रश्न को सदैव के लिए नहीं निपटाया गया है?

माननीय उपाध्यक्षः मैं स्वयं इस विषय के बारे में बताने का प्रयत्न कर रहा हूँ। जब कभी मैं कठिनाई महसूस करता हूँ तो मैं माननीय सदस्य श्री कामथ से सहायता देने के लिए कहूँगा। मैंने पहले कहा है कि मैं इस बात को जानने के लिए चिन्तित हूँ कि आगे का विषय क्या है। मैं एक क्षण के लिए यह मान लेता हूँ कि दोनों ही विधेयक प्रस्तुत किये गये थे और दूसरे मसौदा विधेयक को खंड प्रति खंड विचार किया गया था। इससे आगे क्या है? कानूनी आपत्ति क्या है?

पंडित ठाकुर दास भार्गवः मेरा निवेदन है कि मुझे दो या तीन मिनट दिये जायें, ताकि मैं अपनी स्थिति स्पष्ट कर सकूं। इस विषय का एक अन्य पहलू भी है। इसके अलावा यह एक सैद्धान्तिक नियम है कि मूल विधेयक पर खंड प्रति खंड और शब्द प्रति शब्द विचार किया जाना चाहिए इस तरह कि पूरे विधेयक पर विचार किया जाना है कि मूल विधेयक के प्रत्येक खंड पर विचार हो सके और उसके बाद नये खंड पर विचार किया जाना चाहिए, तत्पश्चात् अनुसूची, और तब नई अनुसूची पर संसदीय व्यवहार यही प्रदान करती है। दूसरा प्रश्न यह है कि इसका क्या प्रभाव हुआ? इसके बाद क्या होगा, यही प्रश्न अब आपके सामने है। मैं विनम्र होकर व्यवहार और कानून