अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 397

382 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(28)
अध्याय II
दाम्पत्य अधिकारों और न्यायिक विच्छेद का प्रत्यावस्थान

(27) वैवाहिक अधिकारों के प्रत्यानयन के लिए आवेदनः जब पति अथवा पत्नी बिना किसी उचित कारण के एक-दूसरे के समाज से अलग हो जाते हैं तो पीडि़त पक्ष जिला न्यायालय में दाम्पत्य अधिकारों की वापसी (प्रत्यानयन) के लिए प्रार्थना-पत्र दे सकता है और न्यायालय, आवेदन में दिये गए कथनों की सत्यता से संतुष्ट होकर तथा जांच करके कि आवेदन स्वीकार करने में कोई अड़चन नहीं है, तद्नुसार दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यानयन का निर्णय दे सकता है।

(28) दाम्पत्य अधिकारों के दाम्पत्य के लिए आवेदन का उत्तरः दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यानयन के लिए आवेदन के उत्तर में कोई सफाई नहीं दी जायेगी जिससे कि वह न्यायिक-विच्छेद के लिए अथवा विवाह विघटन के लिये कोई आधार न बन सके।

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(29) न्यायिक विच्छेदः विवाह का कोई भी पक्ष, चाहे वह इस संहिता के लागू होने से पहले अथवा बाद में संपन्न हुआ हो, निम्नलिखित आधार पर न्यायिक विच्छेद के निर्णय की प्रार्थना करते हुए जिला न्यायालय में आवेदन कर सकता है कि दूसरे पक्ष नेःµ

(क) आवदेन दिये जाने की तिथि से कम से कम दो वर्ष पूर्व से बिना किसी

कारण से आवेदक का परित्याग कर दिया हो_ अथवा

(ख) ऐसी निर्दयतापूर्ण व्यवहार का दोषी है जिससे आवेदक का दूसरे पक्ष के साथ रहना

असुरक्षित हो गया हो_

(ग) रतिज (यौन) रोग से पीडि़त रहा है जो संक्रामक है और उसने आवेदन दिए जाने

की तिथि से कम से कम एक वर्ष से आवेदक से संपर्क नहीं रखा हो_ अथवा

(घ) कुष्ठ रोग से बहुत अधिक पीडि़त हो_ अथवा

(ड) विवाह के समय से ही विक्षिप्त मस्तिष्क का रोगी रहा हो_ अथवा

(च) विवाह के समय व्यभिचारी रहा हो।

व्याख्याः इस खंड में, सजातीय कथनों और व्याकरणीय भिन्नताओं से फ्परित्यागय् कथन का अर्थ है कि बिना किसी उचित कारण के स्व ओर दूसरे पक्ष की इच्छा के विरुद्ध अथवा बिना सहमति के, दूसरे पक्ष का विवाह से परित्याग करना है।