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(31) दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यानयन के लिए आवेदनः जब पति अथवा पत्नी बिना किसी उचित कारण के एक दूसरे के समाज से अलग हो जाते हैं तो पीडि़त पक्ष जिला न्यायालय में दाम्पत्य अधिकारों की वापसी (प्रत्यानयन) के लिए प्रार्थना-पत्र दे सकता है और न्यायालय, आवेदन में दिये गये कथनों की सत्यता से संतुष्ट होकर तथा जांच करके कि आवेदन स्वीकार करने में कोई कानूनी अड़चन नहीं है, तद्नुसार दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यानयन का निर्णय दे सकता है।
(32) वैवाहिक अधिकारों के प्रत्यानयन के लिए आवेदन का उत्तरः दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यानयन के लिए आवेदन के उत्तर में कोई सफाई नहीं दी जायेगी जिससे कि वह न्यायिक विच्छेद के लिए अथवा अलगाव के लिए कोई आधार न बन सके।
(33) न्यायिक विच्छेदः विवाह का कोई भी पक्ष, वह चाहे इस संहिता के लागू होने से पहले अथवा बाद में, संपन्न हुआ हो, निम्नलिखित आधार भाग IV , खंड 30, पर न्यायिक विच्छेद के निर्णय की प्रार्थना करते हुए जिला न्यायालय पृष्ठ 21 में आवेदन कर सकता है कि दूसरे पक्ष नेंःµ
(क) कम से कम दो वर्ष से आवेदक का परित्याग कर दिया हो_ अथवा
(ख) आवेदक के साथ ऐसे निर्दयतापूर्ण व्यवहार का दोषी रहा हो जिससे कि आवेदक
का दूसरे पक्ष के साथ रहना असुरक्षित हो गया हो_ अथवा
(ग) दूसरा पक्ष असाध्य यौन (रजित) रोग के संक्रामक रूप से पीडि़त रहा हो और आवेदन
देने से कम से कम एक वर्ष तक आवेदक से संपर्क न रखा हो, अथवा
(घ) यदि रजिस्ट्री विवाह मानते हुए भी, यह खंड 8 के उपखंडों (1) व (4) में दिए
गए किसी भी शर्त के प्रतिकूल हैः
इसके होते हुए भी, यदि कोई विवाह, विवाह-विच्छेद की कार्यवाही आरम्भ
होने से पहले, खंड 21 के अन्तर्गत रजिस्ट्री विवाह के रूप में पंजीकृत है
तो खंड 7 के उपखंड (5) में अन्तर्विष्ट निषिद्ध सीमा में पड़ने वाले किसी
भी मामले पर इस खंड में अन्तर्विष्ट कोई भी प्रावधान लागू नहीं होगा।
(31)
अध्याय - तीन
विवाह के निष्प्रभावी होने से संबंधित सामान्य प्रावधान
(30) न्यायालय के आदेश के अलावा विवाह का निष्प्रभावी न होनाः इस भाग में अन्तर्विष्ट किन्हीं प्रावधानों के होते हुए भी, कोई भी विवाह, चाहे वह इस संहिता