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(क) पुरुष पक्ष की पूर्व पत्नी विवाह के समय जीवित रही हो_ अथवा
(ख) खंड (5) के उपखंड (ख) में यथा परिभाषित, दोनों पक्ष निषिद्ध
संबंधों की सीमा में हों_
( ii ) इस संहिता के लागू होने से पहले या बाद में सम्पन्न, कोई भी विवाह इस
आधार पर कि विवाह के समय कोई भी पक्ष बुद्धिहीन या विक्षिप्त रहा हो
अथवा विवाह के समय प्रतिवादी नपुंसक रहा हो और यह कार्यवाही आरंभ
होने तक उसकी स्थिति ऐसी ही रही हो, शून्य करार दिये जाने योग्य नहीं
होगा जब तक कि विवाह सम्पन्न होने के 3 वर्ष के अन्दर विवाह विघटन
के संबंध में कोई अभ्यावेदन नहीं किया जाता है, अथवा इस संहिता के
लागू होने से पहले संपन्न हुए विवाह की स्थिति में संहिता लागू होने के 2
वर्ष के अन्दर अभ्यावेदन न दिया गया_ अथवा
( iii ) शून्य करार दिये जाने योग्य विवाह के मामले में इस संहिता के लागू होने
से पहले या बाद में संपन्न हुआ कोई विवाह, इस आधार पर आवेदक की
सहमति अथवा जहां पर उसके संरक्षक की सहमति की आवश्यकता है, ऐसे
संरक्षक की सहमति बल प्रयोग से अथवा धोखा-धड़ी से प्राप्त की गई हो
जब तक कि विवाह विघटन का आवेदन जबरदस्ती अथवा धोखा-धड़ी का
पता लगने के बाद एक वर्ष के अन्दर न दिया होः
इसके बाद भी न्यायालय ऐसे अभ्यावेदनों को निरस्त कर देगा यदिµ
(क) इस संहिता के लागू होने से पहले संपन्न हुआ विवाह के शून्य करार होने की स्थिति में, जब संहिता आरम्भ होने से पहले बल प्रयोग का कार्य बन्द हो गया हो अथवा जालसाजी का पता लगा लिया गया हो_ और विवाह विघटन का आवेदन अथवा इस संहिता के लागू होने के एक वर्ष के बाद दिया गया हो।
(ख) आवेदक अपनी सहमति से विवाह तक दूसरे पक्ष के साथ, बल प्रयोग कार्य बन्द होने अथवा जालसाजी का पता लगाने के बाद, पति/पत्नी के रूप में रहे हों, जैसी भी स्थिति हो।
(34)
(30) विवाह विघटन के अन्य आधारः इस संहिता के आरम्भ होने से पहले या बाद में संपन्न हुआ कोई भी विवाह निम्नलिखित किसी आधार पर विच्छेद हो जाएगा, यथाःµ
भाग IV , खंड 29, और पृष्ठ 2