अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 405

390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कार्रवाई में किसी भी विवाह को निष्प्रभावी करने के मामले में, जहां पर

अभिकर्ता की राय में, लोक हित में उचित है अथवा कोई न्यायालय ऐसा

करने की अनुमति दे।

( ii ) किसी विवाह के विलोपन की किसी कार्यवाही को, जहां विलोपन का समुचित

निदान न्यायालय द्वारा अमान्यता का निर्णय देना ही है, प्रारम्भ करना_

(2) राज्य सरकार उस तरीके को विनियमित करने के लिए नियम बना सकता है जिसमें

अभिकर्ता अपने अधिकार का प्रयोग कर सके और वे सब जो किसी अधिकारों

के प्रयोग के लिए आकस्मिक अथवा परिणामकारी है।

(35) विघटन (विवाह-विच्छेद) का आवेदन प्रस्तुत करने के लिए सक्षम व्यक्तिः जब कोई विवाह चाहे वह इस संहिता के आरम्भ होने से पूर्व अथवा बाद में संपन्न हुआ हो, इस आधार पर प्रतिवाद किया जाता है कि यह एक शून्य विवाह है, तो न्यायालय इस तर्क को इस आधार पर स्वीकार कर सकता हैः

(1) विवाह के किसी पक्ष द्वारा विघटन का आवेदन दिये जाने पर_ अथवा

(2) विवाह से प्रभावित अथवा रुचि रखने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किसी कार्रवाई में

यह मुद्दा उठाये जाने पर।

(3) जब किसी विवाह का, चाहे वह इस संहिता के आरम्भ होने से पूर्व अथवा बाद

में संपन्न हुआ हो, इस आधार पर विरोध किया जाता है कि यह शून्य होने योग्य

विवाह है, तो न्यायालय द्वारा ऐसा कोई तर्क, विवाह के किसी पक्ष के द्वारा ऐसा

करने के अतिरिक्त, स्वीकार नहीं होगाः

इन सबके होते हुए भी कोई पक्ष राहत पाने के उद्देश्य से अपनी कमी अथवा

अयोग्यता का लाभ प्राप्त नहीं कर पायेंगे।

(38)

(36) विवाह संपन्न होने के तीन वर्ष के अन्दर विवाह-विच्छेद के लिए कोई आवेदन स्वीकार नहींःµ

(1) इस भाग में अन्तर्विष्ट होते हुए भी कोई भी सक्षम न्यायालय विवाह-विच्छेद की

डिक्री के लिए कोई आवेदन तब तक स्वीकार नहीं करेगा जब तक कि आवेदन

दिये जाने के समय तक विवाह के तीन वर्ष न बीत गये होंः

इसके बाद भी, न्यायालय, उच्च न्यायालय द्वारा प्रार्थना-पत्र देने के संबंध में बनाये