अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 406

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गये नियमों के अनुसार, विवाह संपन्न होने के तीन वर्ष पूर्व भी आवेदन देने की

स्वीकृति इस आधार पर दे सकता है कि आवेदक की कठिनाइयों के कारण यह

एक अपवाद है अथवा प्रतिवादी की तरफ से एक विशेष प्रकार का गलत आचरण

किया जा रहा है, परन्तु यदि न्यायालय को आवेदन की सुनवाई के समय यह

प्रतीत होता है कि आवेदक नक मिथ्या तथ्यों को प्रस्तुत करके अथवा मामले की

प्रकृति को छिपाकर आवेदन देने की अनुमति प्राप्त की है तो न्यायालय, इस शर्त

पर आज्ञप्ति का आदेश दे सकता है, कि उसका प्रभाव विवाह संपन्न होने के

तीन वर्ष बाद ही प्रभावी होगा अथवा आवेदन बिना किसी पूर्वाग्रह के निरस्त कर

सकता है जिसे कथित तीन वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद उसी आधार पर

लाई जानी है उसी अथवा वस्तुतः उन्हीं तथ्यों जिन्हें उस आवेदन के समर्थन में

दिया गया हो जो कि निरस्त हो चुका है।

(2) विवाह संपन्न होने के तीन वर्ष से पहले इस खंड के अन्तर्गत तलाक का कोई

आवेदन देने की अनुमति से संबंधित कोई भी प्रार्थना-पत्र निरस्त करते समय

न्यायालय विवाह से संबंधित बच्चों के हितों का तथा ऐसी बातों का पूरा ध्यान

रखेगा कि क्या तीन वर्ष की अवधि समाप्त होने से पूर्व पक्षों के बीच किसी

प्रकार के युक्तिसंगत समझौते की संभावना है।

(39)
विवाह-विच्छेद का प्रभाव

(37) पक्षों को पुनर्विवाह की स्वतंत्रताः जब कोई विवाह किसी प्राधिकृत न्यायालय के आज्ञप्ति द्वारा विच्छेद हो गया हो और इस आज्ञप्ति के विरुद्ध कोई अपील न हुई हो अथवा ऐसी कोई अपील निरस्त हो चुकी हो तो ऐसी स्थिति में विवाह के किसी पक्ष द्वारा पुनः विवाह कियाजाना विधिसंगत होगा मानो कि पहला विवाह मृत्यु के कारण विच्छेद हो गया हो।

(36)

(50) पक्षों को पुनर्विवाह की स्वतंत्रताः जब जिला न्यायाधीश के (नया) विवाह विघटन के निर्णय को उच्च न्यायालय द्वारा स्वीकृति मिल जाने के छह महीने की समाप्ति के बाद, अथवा जब विवाह विघटन के उच्च न्यायालय के आज्ञप्ति के छह महीने बीत जाने के बाद भी इस आज्ञप्ति के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जाती हैः