अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 408

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(ग) विवाह अकृतता की आज्ञप्ति अथवा विवाह विघटन या तलाक के निर्णय के अतिरिक्त, इस भाग के अन्तर्गत राहत देना, केवल उन्हीं मामलों को छोड़कर जिसमें आवेदक आवदेन दिये जाने के समय भारत में रह रहा हो।

(37) विवाह को अमान्य घोषित किए जाने का प्रभावः

(1) जब कोई विवाह इस आधार पर विघटित हो जाता है यह शून्य हो गया है अथवा कोई विवाह शून्य घोषित कर दिया जाता है तो विवाह शुरू से ही शून्य हुआ माना जाता है और इस विवाह के फलस्वरूप पैदा हुए बच्चे सदैव अवैध माने जायेंगेः

बशर्ते इसके जब कोई विवाह इस आधार पर विघटित हो जाता है अथवा शून्य घोषित हो जाता है कि पूर्व पत्नी या पति जीवित थे और यह विनिर्णीत हो जाता है कि परिवर्ती सम्पन्न विवाह परस्पर विश्वास पर सम्पन्न हुआ था और एक या दोनों पक्षों को यह विश्वास हो गया था कि पूर्व पत्नी या पति की मृत्यु हो चुकी है और ऐसे मामलों में आज्ञप्ति दिये जाने से पूर्व, जन्म लिये बच्चों के बारे में आज्ञप्ति में विशेष उल्लेख किया जायेगा और वे सभी मामलों में अपने माता-पिता की वैध संतान माने जाएंगे।

(2) जब कोई विवाह खंड 29 और 30 में दिए गए किसी भी आधार

भाग IV , खंड 29

पर विच्छेछित हो जाता है तो इस विवाह के परिणामस्वरूप पैदा (1), पृष्ठ 21 हुए सभी बच्चे सदैव हर प्रकार से अपने माता-पिता की वैध

सतान माने जायेंगे/रहेंगे और उनके नामों का आज्ञप्ति में उल्लेख किया जायेगा।

क्षेत्राधिकार और कार्य विधि

(39) इस भाग के अन्तर्गत राहत दिए जाने वाली शक्तियों की सीमाः इस भाग में दिया गया कोई भी उपबंध किसी न्यायालय (नया) को इन मामलों में प्राधिकृत नहीं करेगाःµ

(क) विवाह विघटन की आज्ञप्ति देने के मामले में_

(1) किसी शून्य अथवा शून्यकरणीय विवाह की स्थिति में जो कि भाग 7 के

खंड 2 अथवा भाग 10 के खंड 2 के प्रतिकूल हो अथवा जिसे इस आधार

पर बचाया जा सके कि विवाह के समय कोई भी पक्ष महत्वपूर्ण था और

इस कार्रवाई के आरम्भ होने तक ऐसा चलता रहा हो जब तब तक कि

विवाह किसी प्रान्त में न हुआ हो और आवेदक यह आवेदन दिये जाने के

समय प्रान्त का निवासी न हो, अथवा