हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 41

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

और समिति को खंड प्रति खंड विचारित किये जाने के लिए है, तो स्थिति नितांत स्पष्ट है कि यह विधेयक उसी प्रवर समिति को सौंप दिया जाये। मैं नहीं चाहता कि प्रतिवेदन इसी सत्र में नहीं आना चाहिएµमैं चाहता हूँ वे दो घंटे का समय लें और मूल विधेयक को खंड-व-खंड विचार करें और तब हम इसे विचार के लिए लेंगे। यह बिन्दु जिसका निवेदन करता हूँ, पर अध्यक्ष महोदय द्वारा कभी भी विचार नहीं किया गया और मैं आपसे सविनय निवेदन करता हूँ कि आप इस विषय पर कृपापूर्वक विचार करें।

इस विषय को अलग करके और जैसाकि आपने मुझे कहा है, इस विषय पर अधिक समय न लगाया जाये, मैं अन्य विषयों के बारे में कुछ कहना चाहूंगा। अब प्रश्न यह है कि इसका क्या प्रभाव हुआ है। मैंने पहले ही यह स्वीकार किया है कि हमें नियमों का पालन करना चाहिए और इस प्रकार के विषय में सैद्धान्तिक नियम ऐसे हैं, जिनकी अवहेलना नहीं की जा सकती। तब इसका वास्तविक प्रभाव क्या है? यही मैं आपसे निवेदन कर रहा हूँ। अब मूल विधेयक के उपबंधों और प्रवर समिति से आए विधेयक के उपबंधों के बीच जो अंतर अथवा कमियां हैं वे केवल प्रक्रिया के मामलों तक ही सीमिति नहीं हैं। अपितु अन्तर्निहित विषय-वस्तु तक है। बक्शी टेकचन्द और पंडित बाल कृष्ण शर्मा द्वार प्रस्तुत असहमति की टिप्पणी में यह बताया गया है कि फिर से तैयार किए गये मसौदे वाले विधेयक में तथ्य परक उग्र परिवर्तन किए गए हैं और उन्होंने इन परिवर्तनों के उदाहरण दिये हैं। मैं इस बात से संतुष्ट नहीं हूँ कि उन्होंने दिये गये समय में सभी ठोस परिवर्तन कर लिए हों, और मैं आपसे सविनय निवेदन करूँगा कि इस दृष्टि से भी इन बातों पर विचार किया जाए। जब मैंने आपना भाषण प्रारंभ किया था तब मैंने इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया था कि इस तारतम्य में फिर से मसौदा तैयार किये जाने वाले विधेयक के विचारित किये जाने के बाद जैसे कि प्रवर समिति से आया है उसमें कई परिवर्तन किये गये थे, जो ऐसी प्रथाओं के लिए निश्चय ही विनाशकारी हैं, जो पंजाब में नहीं हैं। मैं सर्वप्रथम एक उत्तराधिकारी की नियुक्ति करने वाली प्रथा की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। जहां तक उत्तराधिकारी की नियुक्ति का संबंध है, इस बारे में हमने माननीय डॉ. अम्बेडकर के विचार समझ लिए हैं। उन्होंने स्वयं कहा कि उनका विचार था कि उत्तराधिकारियों की चयन क्रिया एक कृत्रिम मामला है। मेरा भी यही विचार है। हम श्रीमती हंसा मेहता के उस समय के भाषण को याद करते हैं, जब यह विधेयक चयन समिति को भेजा गया था। उन्होंने कुछ टिप्पणियां की थीं। अब वर्तमान विधान के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी उत्तराधिकारी को गोद नहीं ले सकता, विवादित स्थिति के अतिरिक्त। जबकि मूल विधेयक के अनुसार कृत्रिम और गोद लेने की विधियां भी स्वीकार्य थीं। जहां तक दत्तक लेने का संबंध है, किसी पुत्र का दत्तक रूप से ग्रहण करना केवल कपोल कथा है किस प्रकार बेटा वास्तविक बेटा हो सकता है? परन्तु हिंदू कानून में इस प्रकार की व्यवस्था है और मेरा उनके साथ कोई विवाद नहीं है जो इसमें विश्वास करते हैं। परतु संपत्ति के उत्तराधिकारी की नियुक्ति के संबंध में जैसे कि रोम वासियों ने नोमिनीस हेरेडिटियों के रूप में किया।