हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 42

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यदि पंजाब के लोगों के पास उसी तरह की प्रथा है तो किसी को उसे रोकने का कोई अधिकार नहीं है। हमारी रीति-रिवाजों के अनुसार किसी भी उत्तराधिकारी की नियुक्ति में भले ही दत्तक के समान प्रभावी हो, फिर भी इसमें कोई धार्मिक प्रभावोदपादकता नहीं है। इसके लिए विशेष धार्मिक उत्सव नहीं किए जाते। इसमें आयु का प्रश्न नहीं उठता। कोई पुत्र परिवार में दत्तक के रूप में आरोपित नहीं किया जाता, परन्तु वह अपने ही परिवार में वैसे ही रहता है। इस संबंध में कई प्रकार के नियम हैं और पंजाब उच्च न्यायालय ने इस बिन्दु पर सैंकड़ों निर्णय दिये हैं। यह प्रथा लोगों के मन में सशक्त रूप से जड़ें जमा चुकी है और आप कम से कम एक करोड़ लोगों के रिवाज में हस्तक्षेप करेंगे, यदि आप इस बात को अपनी संहिता में सम्मलित नहीं करते। हिंदू संहिता के वर्तमान स्वरूप के अनुसार उसमें किसी भी अन्य प्रकार के दत्तक लेने की अनुमति नहीं है। यह बात दूर तक नहीं जाती। मैं समझता हूँ कि जहां तक रिवाज का संबंध है, उसमें रिवाज को नकार दिया गया है, उस सीमा तक जहां तक मान्यता दी गई है।

जब मैंने डॉ. अम्बेडकर के उस भाषण को पढ़ा, जिसे उन्होंने उस समय दिया था जब यह प्रस्ताव प्रवर समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, मैंने यह समझा था कि उनकी प्रवृत्ति तर्कसंगत है और उन्होंने रिवाज के संबंध में कुछ वक्तव्य दिये थे जो इस विधेयक के कुछ उपबंधों के विपरीत हैं। श्रीमान, मुझे काफी संदेह है कि क्या विधि विभाग की समिति में विधि मंत्री को भी सम्मलित किया गया था? मैं यह नहीं जानता कि वे कौन-कौन व्यक्ति थे, जिन्होंने इस विधेयक में परिवर्तन किये हैं, परन्तु इसके साथ ही मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि मैं अब ज्यादा सशक्त रूप से संदेह करता हूँ। यद्यपि मुझे इसके बारे में ज्ञात नहीं था कि डॉ. अम्बेडकर वहाँ नहीं थे, क्योंकि वह इस बात के लिए अधिक चिंतित थे कि 90 प्रतिशत लोगों के रिवाज प्रभावित नहीं किये जाएं, जैसाकि मैं भी इस बारे में चिंतित हूँ। या तो यह बात उनसे छूट गई, उन्होंने इसकी सराहना नहीं की, अथवा कुछ ऐसे अन्य व्यक्ति हैं जो प्रवर समिति के सदस्य नहीं थे, पर उन्होंने विधेयक को पूर्णतया बदल दिया, जिसके बारे में उन्हें वैसा करने का कोई अधिकार नहीं था। इसके बाद वहाँ दूसरा विधेयक आ गया, उसी पर विचार किया गया। इसलिए यह एक काल्पनिक कथा है कि वहाँ मूल विधेयक था और उसी पर विचार किया गया था। श्रीमान, मैं उस कार्रवाई के पृष्ठ 3652 (9 अप्रैल, 1948) की ओर आपका ध्यान आकर्षित करूंगा, जिसमें डॉ. अम्बेडकर ने कहा थाःµ

फ्उनकी दूसरी टिप्पणी यह थी कि विधेयक पर पारम्परिक कानून की दृष्टि से विचार नहीं किया गया था। उन्होंने प्रिवी काउंसिल के कुछ आदेश उदृधृत किये थे। मुझे यह विचार करना चाहिए था कि आज इस समय यह आवश्यक था कि प्रिवी काउंसिल के प्राधिकार को बताया जाये, क्योंकि निर्णयों के लम्बे दौर द्वारा यह भली-भांति स्थापित किया जा चुका है कि जहां तक हिंदुओं का संबंध है उनके रिवाज फ्स्मृतिय् के पाठ को पीछे छोड़ देते हैं। हम सभी