अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 412

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और अविवाहित है, पत्नी की सुरक्षा करेगा और उसके भरण-पोषण और निर्वहन के

लिए यदि आवश्यक है, पति की कुल संपत्ति का अथवा मासिक आधार पर अथवा

नियतकालिक रूप से उस अवधि के लिए, जो कि पत्नी के पूरे जीवन-काल से

अधिक नहीं होगी, उसकी अपनी संपत्ति, यदि कोई है, को ध्यान में रखकर धन का

भुगतान करेगा। उसके पति की संपत्ति से और पक्षों के आचरण न्यायसंगत होगा।

(2) यदि न्यायालय संतुष्ट है कि उपखंड (1) के अन्तर्गत आदेश दिए जाने के उपरान्त

किसी भी समय दोनों पक्षों की परिस्थितियों में कोई परिवर्तन आया है, तो यह किसी

भी पक्ष के द्वारा कहे जाने पर अपने आदेश को इस प्रकार परिवर्तित कर सकती है,

संशोधित कर सकती है अथवा निरस्त कर सकती है जैसा कि उसे उचित प्रतीत हो।

(3) यदि न्यायालय संतुष्ट है कि पत्नी ने, जिसके पक्ष में उपखंड (1) या (2) के

अन्तर्गत निर्णय दिया गया हो, पुनः विवाह कर लिया है अथवा सच्चरित्र नहीं है,

वह अपना आदेश निरस्त कर सकता है।

(48)

(46) बच्चों का संरक्षणः इस भाग के अन्तर्गत किसी भी कार्रवाई में, न्यायालय समय-समय पर अंतरिम आदेश दे सकता है और डिक्री में ऐसे प्रावधान बना सकती है जो न्यायसंगत और उचित हो। छोटे बच्चों के संरक्षण, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए, उनकी इच्छाओं का ध्यान रखते हुए जहां तक संभव है और डिक्री देने के बाद, आवेदक द्वारा इस उद्देश्य के लिए आवेदन दिए जाने पर, बच्चों के संरक्षण, भरण-पोषण और शिक्षा के संबंध में अपने सभी आदेशों और प्रावधानों के संबंध में अपने आदेश को समय-समय पर वापस ले सकती है, रोक सकती है अथवा परिवर्तित कर सकती है। जो कि उन अंतरिम आदेशों और आज्ञप्तियों में दिया गया हो, जिनमें आज्ञप्ति प्राप्त करने की आर्रवाई अभी लम्बित हो।

(45)

(45) संभरण वादकालीनः इस भाग के अन्तर्गत किसी भाग 6 , मुम्बई कार्रवाई में जहां न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि पत्नी के पास, अधिनियम अपना व्यय वहन करने के लिए और पत्नी के प्रार्थना पत्र पर, हो

रही कार्रवाई में आवश्यक खर्च के लिए पर्याप्त आय का स्वतंत्र आधार नहीं है तो वह पति को कार्रवाई का खर्च देने के लिए आदेश कर सकती है और कार्रवाई के दौरान यह व्यय महीने के आधार पर इस तरह कि पति की कुल आय के पांचवे भाग से अधिक नहीं होना चाहिए अथवा जैसा न्यायालय को उचित प्रतीत हो।