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में इस तरह से लागू होगा जैसे कि दो व्यक्तियों के बीच अपनाए हुए विवाह पर
लागू होते हैं और जो उस समय की प्रचलित विधियों के अनुसार होता है।
(3) किसी स्त्री का किसी पुरुष के साथ दाम्पत्य मिलाप, जो कि खंड 3 में ‘मरुमकट्यम
विधि’ की परिभाषा के उपखंड (3) में उल्लिखित किसी भी समुदाय से संबंधित
हो, चाहे वह किसी कानून अधि-द्वारा शासित हो अथवा नहीं, जो कि इस संहिता
के आरम्भ होने से पूर्व उस समुदाय में प्रचलित रीति-रिवाजों, समारोहों के द्वारा
संपन्न हुआ हो जिससे कि दोनों अथवा कोई भी पक्ष संबंधित हो, हर तरह के
सभी उद्देश्यों के लिए उपखंड (2) को सम्मिलित करें। हमेशा वैधिक विवाह के
रूप में माना जायेगा यदि संगठन के दोनों पक्षों के बीच समरक्तता अथवा रिश्ते के
किसी स्तर पर आपस में कोई संबंध नहीं है जिससे कि उनके मध्य दाम्पत्य-एकता
इस समुदाय की परम्परा और रीति-रिवाज के कारण निषिद्ध हो गया है जिससे
कि वे संबंधित हो अथवा कोई भी पक्ष संबंधित रहा होः
बशर्ते, इस उपखंड में अन्तर्विष्ट कुछ उपबंधों के अतिरिक्त, कोई भी उपबंध दोनों
पक्ष के अथवा किसी भी एक पक्ष के समुदाय के जिससे कि वे संबंधित हो,
प्रचलित परम्पराओं के अनुसार इस संहिता के आरम्भ होने से पूर्व विवाह विघटन
के किसी निर्णय को अवैध हुआ नहीं माना जाएगा।
(51क) कुछ वैध विवाहों के संहिता के पहले या बाद में हुए विघटन से बच्चों के अधिकार प्रभावित न होनाः इस संहिता के आरंभ होने से पूर्व एक स्त्री, जो कि उस समय प्रचलित मरुकमट्यम अथवा अलियसंतान विधि द्वारा अधिशासित रही हों, और हिंदू पुरुष के बीच संपन्न हुआ विवाह किसी भी कानून के अनुसार वैध विवाह है, चाहे विवाह के समय वह चल रहा हो अथवा बाद में पारित किया गया हो, अथवा खंड 51 के उपखंड (3) के कारण से हुआ हो, ऐसा विवाह-विघटन चाहे मृत्यु से अथवा अन्य किसी कारण से हुआ हो और चाहे इस संहिता के लागू होने से पूर्व या बाद में हुआ हो ऐसे विवाह के बच्चों अथवा उनके वंशजों की उस संहिता के अन्तर्गत उनके कानूनी अधिकारों और महत्ता को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करेगा।
(27) पूर्व विवाहों की रक्षाः इस संहिता के लागू होने से पूर्व हिंदुओं के बीच संपन्न हुआ कोई विवाह जो कि अन्यथा वैध है, कभी भी मात्र इस तथ्य पर अवैध नहीं माना जाएगा अथवा कभी अवैध रहा होगा कि दोनों पक्ष एक ही गोत्र अथवा प्रवर से संबंधित रहे हों अथवा भिन्न जाति के हैं अथवा उसी जाति के उप-भाग है।
खंड 4 , खंड 3, पृष्ठ (व्याख्या)