हिंदू विवाह वैधता विधेयक - Page 43

28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह जानते हैं। परन्तु हम कर क्या रहे हैं? क्या हम जो कर रहे हैं वह यह है। हम नये रिवाजों की संवृद्धि को रोक रहे हैं। हम वर्तमान रिवाजों को नष्ट नहीं कर रहे हैं। हम वर्तमान रिवाजों को मान्यता दे रहे हैं क्योंकि हिंदू समाज में जो नियम और कानून प्रचलित हैं वे रीति-रिवाजों के परिणाम हैं। वे रीति-रिवाजों से ही उत्पन्न हुए हैं और हम यह महसूस करते हैं कि वे रीति-रिवाज इतने मजबूत हैं कि हम उन्हें एक कानूनी व्यवस्था द्वारा वास्तव में राज व्यवस्था में मूर्तरूप और विधान मण्डल द्वारा जीवन दे सकते हैं।य्

डॉ. अम्बेडकर ने श्रीयुत रोहिनी कुमार चौधरी के भाषण का उल्लेख कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा थाःµ

फ्हमने जन-जातियों के लोगों के प्रश्न पर विचार नहीं किया था, जिनका जीवन निःसन्देह अधिकांशतः पारम्परिक कानून द्वारा अधिशासित होता है। यदि मेरे मित्र ने इस संहिता में इस परिभाषा को पढ़ा होता कि कौन हिंदू है और कौन नहीं है और किस पर यह संहिता लागू होती है, तो उन्होंने यह भी देखा होता कि वहां तक खंड है, जिसमें केवल यह बताया गया है कि ऐसे व्यक्ति जो मुसलमान, पारसी या इसाई नहीं हैं, हिंदु हैं। इसका परिणाम यह है कि यदि जनजाति का व्यक्ति यह कहता है कि वह हिंदू नहीं है तो इस संहिता के अन्तर्गत उसे पूर्णतया छूट होगी कि वह अपने अभिप्राय के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करे कि वह एक हिंदू नहीं है और यदि न्यायालय द्वारा यह निष्कर्ष स्वीकार कर लिया जाता है तो वह निश्चय ही उन बातों के लिए बाध्य नहीं होगा जैसी कि इस विधेयक में दी गई हैं।य्

अतः स्थिति यह हैः यदि मैं अपनी प्रथाओं को अच्छा मान कर स्वीकार करता हूँ, यदि मैं उन रिवाजों के अनुसार अपने उत्तराधिकारियों की नियुक्ति करता हूँ जो मुझे अधिशासित करते हैं, तथा डॉ. अम्बेडकर के अनुसार मैं हिंदू नहीं हूँ। यही मेरी कठिनाई है। आप उन एक करोड़ लोगों के लिए व्यवस्था करें और उनके रिवाजों को स्वीकार करें, या फिरख्...,

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (विधि मंत्री)ः मेरी कोई इच्छा नहीं है कि मैं अपने मित्र के भाषण में हस्तक्षेप करूं। परन्तु मुझे कहना चाहिए कि मैं उनकी उस व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता, जो उन्होंने मेरे भाषण के हिस्से में जोड़ी है। क्योंकि यह नितान्त अलग विषय है।

पंडित ठाकुर दास भार्गवः मुझे प्रसन्नता है कि मैं गलत हूँ। यह मुझे सन्तोष प्रदान करता है कि डॉ. अम्बेडकर नहीं चाहते थे कि एक करोड़ लोग हिंदू विधि की सीमा से बाहर हो जाएं। परन्तु इसके साथ ही मैं यह दलील दे रहा था कि यदि यह रिवाज़ अच्छा हैµऔर मैं भी स्वीकार करता हूँ कि यह रिवाज़ अच्छा है, क्योंकि इसी विधेयक में दी गई परिभाषा के अनुसार रिवाज़, प्राचीन रिवाज़ है, तर्कसंगत है तथा लोक नीति अथवा नैतिकता के विरुद्ध नहीं है। मैं दावा करता हूँ कि इस रिवाज़ को संहिता द्वारा मान्यता दी जानी चाहिए, परन्तु उसमें इसे मान्यता नहीं दी गई है। किसी सीमा तक कृत्रिम रूप