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सदस्यः ‘यह कोई नया बिल नहीं है।’) मैं ऐसी स्थिति में नहीं हूं कि मैं किए गए बड़े बदलावों की जानकारी दे सकूं। यद्यपि माननीय कानून मंत्री ने कल प्रश्न का उत्तर देने में टालमटोल की थी, तथापि अंत में उन्हें मानना पड़ा कि उन्होंने कोई बदलाव नहीं किए थे, यह बदलाव प्रवर समिति ने किए थे। मैं उस स्थिति में हूँ कि सदन को दिखा सकूं कि बदलाव बहुत गंभीर थे, बहुत अतिवादी थे और ये छोटे बदलाव नहीं थे।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः श्री मान्, एक नियम आधारित आपत्ति है। यदि माननीय सदस्य अपने तर्क के लिए यह आधार चाहते हैं कि प्रवर समिति को इस तथ्य पर बिल का पुनर्गठन करना चाहिए कि जिस पर विचार हुआ वह उसके पास भेजे गए बिल के अलावा कोई और बिल था, यह बात सत्ता पक्ष के सभापति महोदय ने भी ध्यान में रखी है_ उन्हें इस बात पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है। यदि उनके कोई अन्य कारण है, तो वह ऐसा कर सकते है_ वह बिल के पुनर्गठन के लिए उसे प्रवर समिति को देने के लिए अपने संशोधन के बारे में बातें कर रहे हैं। किंतु यदि वह अपने तर्क पर जोर देते हैं, अर्थात् जो बिल प्रवर समिति के विचारार्थ भेजा गया था, वह इस सदन द्वारा नहीं भेजा गया था, जिसका जिक्र सभापति महोदय ने किया है और यह घोषित हो चुका है कि यह वही बिल है।
श्री टी.टी. कृष्णामाचारी (मद्रासः सामान्य)ः यह प्रस्ताव को अस्वीकार करने का एक तर्क हो सकता है।
श्री एल. कृष्णस्वामी भारतीः यदि ऐसा है, तो इस बात को इस तरह विचार-विमर्श द्वारा सुलझाया जा चुका है कि इस पर पुनः चर्चा करना चाहें, तो इसमें सदन का समय ही व्यर्थ जाएगा। इस प्रकार की अवधारणा को सुलझाया गया है और तर्कों को बढ़ाया गया है। वह केवल उन्हें दूहरा रहे हैं। श्रीमान् मैं आपको बताना चाहूँगा कि हम कोई भी तर्क सुन सकते हैं, किंतु हम इनके द्वारा दोहराए जाने वाले उन्ही तर्कों को दोबारा सुनने के लिए तैयार नहीं हैं।
पंडित लक्ष्मीकांत मैत्रेयः क्या मैं अपने मित्र श्री भारती द्वारा उठायी गई आपत्ति के संबंध में कुछ कह सकता हूँ? इन्होंने कहा कि माननीय सदस्य जनाब नजीरुद्दीन अहमद ने बिल के पुनर्गठन के लिए प्रवर समिति को प्रस्तुत अपने संशोधन में वही आधार दिया है जिसका अध्यक्ष महोदय ने जिक्र किया है। मैं यह बल-पूर्वक कहता हूँ और सदन भी इससे सहमत होगा कि प्रत्येक माननीय सदस्य अध्यक्ष महोदय का अनादर किए बिना उन कारणों का उल्लेख करने का पात्र है, जिनसे वह प्रवर समिति को बिल के पुनर्गठन हेतु अपनी अनुशंसा दे सकें। अतः इसमें कोई नियमापत्ति जैसी बात नहीं है। यह एक सदस्य का न्यायसंगत अधिकार है कि वह, वे सभी तर्क दे सकता है, जिनसे वह प्रवर समिति द्वारा पुनर्गठन हेतु एक प्रस्ताव ला सकता है।