406 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय अध्यक्षः मैं सोचता हूँ कि इसमें कोई नियमापत्ति नहीं है, क्योंकि वह अपने संशोधन की बात कर रहे हैं कि बिल पर और रायशुमारी लेने के लिए उसे पुनः परिचालित किया जाए और वह अपने तर्क को और पुष्ट कर रहे हैं कि बिल को कैसे बदला गया हैं। मूल बिल को प्रवर समिति में कैसे संशोधित किया गया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं मानता हूँ, मेरे माननीय मित्र की कोई वास्तविक कठिनाई नहीं है। मेरा विश्वास है कि श्री भारती, जो सभी व्यक्तियों में, सबसे बुद्धिमान हैं, इस स्थिति की वास्तविक कठिनाइयों से पूर्णतया परिचित हैं। इसलिए, मेरा मानना है कि वह बड़ी बुद्धिमत्ता से अध्यक्ष महोदय के माध्यम से मुझे बीच में रोक देना चाहते हैं। अतः मैं यहां तत्काल यहा घोषणा करना चाहता हूँ कि सदन में उपस्थित सभी व्यक्तियों में से मैं, अध्यक्ष के निर्णय का सर्वाधिक सम्मान करता हूँ।
पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः आप इस मामले में क्यों पड़ते हैं?
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मैं केवल यह कह रहा हूँ कि मैं अध्यक्ष के निर्णय को स्वीकार करता हूँ। मैं इस मामले में नहीं पड़ रहा हूँ।
पंडित ठाकुर दास भार्गव (पूर्वी पंजाबः सामान्य)ः आपको इसमें अवश्य पड़ना चाहिए आखिर क्यों नहीं?
श्री नजीरुद्दीन अहमदः किंतु, आदेश क्या थे? आदेश यह था कि बिल पर विचार की अवधि समाप्त नहीं हुई थी, वास्तव में आदेश यह था कि प्रवर समिति के सदस्यों के पास पुराना बिल था और विभागीय बिल था और उन्हें समस्त बातों पर विचार करना चाहिए था और इस आधार पर, मैंने जो तकनीकी आपत्ति उठाई थी कि उक्त विभागीय बिल पर विचार किया गया था किन्तु मूल बिल को शामिल नहीं किया गया था, यही आदेश का प्रभाव था और यही नियम है। मेरा वर्तमान उद्देश्य अब यह दिखाना होगा कि यद्यपि प्रवर समिति के सदस्यों के पास मूल बिल था, और उनके पास विभागीय बिल भी था अर्थात् उनके पास दोनों बिल थे। यद्यपि उनके पास दोनों की तुलना करने और यह देखने का अवसर था कि विभागीय बिल में क्या नया चमत्कारी शामिल किया गया है, उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने अपना कर्तव्य, मैं इस विषय की महत्ता पर विचार करने के संबंध में कहना चाहूंगा कि, एक उतावले तरीके से और अपर्याप्त रूप से तथा अपेक्षाकृत लापरवाही से निभाया। यही दृष्टिकोण था, जिस पर मैं जोर दे रहा था।
एक माननीय सदस्यः आप कानून मंत्री को हिंसा के लिए उकसा रहे हैं।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा, क्योंकि श्री अहमद से बात करने के लिए मेरे पास अनेक तर्क हैं।