412 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं अपने माननीय मित्र के इस तर्क को यह कहते हुए बीच में काटना चाहूँगा कि ऐसा करना बाध्यता था। वह संशोधित प्रारुप प्रवर समिति की बैठक से एक माह पहले भेजा गया था।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः यही वह बिंदु है, जिसका मैं उल्लेख कर रहा था। इस स्वीकारोक्ति के लिए मैं आभारी हूँ। यह प्रारूप प्रवर समिति की बैठक से पहले से तैयार था। इस चरण पर मैं यह बताना चाहूंगा कि सदन को इस बारे में सूचित नहीं किया गया था। मूल बिल को पूरी तरह बदले जाने के लिए सदन से प्राधिकार प्राप्त नहीं किया गया था।
श्री महावीर त्यागीः क्या बीच वाला भाग बिल्कुल वैसा ही था जैसा रिपोर्ट के परिशिष्ट में लगाया गया था।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः इसमें कुछ बदलाव थे। प्रवर समिति द्वारा थोड़े से बदलाव किए गए थे, किंतु गंभीर बदलाव विभाग द्वारा किए गए थे, जिनके बारे में प्रवर समिति को कुछ पता नहीं था।
श्रीमती जी. दुर्गाबाईः प्रवरी समिति ने ही उक्त बदलाव किए थे, न कि विभाग ने।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरा कहना है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने विभागीय प्रारुप की कभी भी विस्तार से जांच नहीं की। वस्तुतः मेरा आशय यह है कि यदि मेरे माननीय मित्र श्री संथानम इस बारे में भारत अथवा अन्य देशों के संपूर्ण संवैधानिक इतिहास में से एक भी उदाहरण प्रस्तुत कर सकें, तो मैं बैठ जाऊंगा। एक बिल जो एक प्रवर समिति को भेजा गया, उसके स्थान पर एक अन्य पूरी तरह से संशोधित बिल साथ में रख दिया गया।
माननीय श्री के. संथानमः मैं कई प्रवर समितियों में रहा हूँ और कई मामलों में मूल बिल को प्रवर समिति द्वारा पूर्ण रूप से संशोधित किया गया है।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः वह एक अलग मुद्दा है।
माननीय अध्यक्षः मैं माननीय सदस्य को बताना चाहूँगा कि अध्यक्ष महोदय ने एक निर्णय दिया है कि प्रवर समिति ने मूल बिल के साथ ही माननीय कानून मंत्री द्वारा किए गए प्रारुप पर भी विचार-विमर्श किया था। उक्त निर्णय के आलोक में, माननीय सदस्य को इस बात पर अपनी टिप्पणियों को समिति करना चाहिए कि प्रवर समिति में मूल बिल में कैसे बदलाव लाया गया। प्रवर समिति में क्या हुआ इस बारे में टिप्पणियां करना माननीय सदस्य के अधिकार क्षेत्र से परे है।