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श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरा कहना यह है कि, यद्यपि प्रवर समिति को मूल बिल और विभागीय प्रारुप पर विचार करना चाहिए था और इस निष्कर्ष पर आना चाहिए था कि वह कार्य यंत्रवत् तरीके से और असमुचित रूप से किया गया था। मेरा तर्क यह है, कि यद्यपि प्रवर समिति को मूल बिल और विभागीय प्रारुप पर विचार करना अथवा मान लिया जाए कि विचार किया जाना चाहिए था और इस निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए था। यदि ऐसा हुआ, तो मेरा तर्क यह है कि यह कार्य सर्वाधिक यंत्रवत् तरीके से तथा सर्वाधिक असमुचित रूप से किया गया। मेरा मानना है कि प्रवर समिति विभागीय बिल में हुए गंभीर बदलावों से प्रभावित हो गई और वह पूरी तरह से एक संशोधित प्रारुप एक गढ़ी हुई वस्तु, जो उसके हाथ में रख दी गई थी, के सम्मोहक प्रभाव में आ गई। प्रवर समिति के सदस्यों पर इसका एक अभूतपूर्व मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ होगा, और प्रवर समिति भी, यद्यपि उसे अधिकार था, कि पूरी तरह से विभागीय प्रारुप पर निर्भर हो जाती चाहे इससे प्राथमिकताएं प्रभावित होगी, भले ही निर्णायक बिल की वैद्यता प्रभावित नहीं होती उससे पूर्णतः प्रभावित हो गई।
मेरा तर्क यह है कि प्रत्येक प्रवर समिति को अनेक बदलाव करने का अधिकार है, किन्तु ऐसा कभी नहीं हुआ कि एक नया बिल, जो प्रवर समिति के समक्ष रखा गया, पूरी तरह बदल दिया जाए और तब वह नए बिल पर विचार-विमर्श आरंभ कर दें, यद्यपि, तकनीकी तौर पर, उनके पास मूल बिल भी था, तब भी उन्होंने नए बिल का ही खंड दर खंड अध्ययन किया। यह गुणवत्ता का मामला था। मेरा तर्क है, कि इस विभागीय बिल के आने से बिल के उचित और अपेक्षातापूर्ण विचार-विमर्श में काफी मात्रा में पूर्वाग्रह उत्पन्न हुए हैं। मेरा तर्क है कि मूल बिल के वाक्यांश एक-एक करके आरंभ किए जाने चाहिए थे और मूल बिल के आधार पर ही बदलाव किए जाने चाहिए थे। इसके बजाय विभागीय बिल का अनिवार्य तौर पर अनुपालन करते देखा गया, जबकि उसमें मूल बिल की शर्तों के संदर्भ भी दिए गए थे। अस्तु, मैं प्रवर समिति के किसी भी सदस्य का अनादर किए बिना यह बताना चाहूँगा कि किसी भी सदस्य के लिए यह एकदम देख पाना असंभव था कि विभागीय बिल में क्या अभूतपूर्व बदलाव किए गए थे और इसी कारण, मैं बताना चाहूँगा कि, अंतिम निर्णायक बिल की प्राथमिकताएं प्रभावित हुई हैं। मैंने यह कभी नहीं कहा कि प्रवर समिति के सदस्यों को बदलाव करने अथवा विभागीय बिल को अपनाने अथवा मूल बिल पर विचार-विमर्श करने का कोई अधिकार नहीं है। मेरा तर्क है और मैं पुनः सादर बोल रहा हूँ, यह कार्य लापरवाही से किया गया था और प्रवर समिति को अपने कार्य के लिए पर्याप्त रूप से विभागीय प्रारुप पर निर्भरता रखनी पड़ी। अतः विभागीय प्रारुप पर विचार करने के कारण, अब वर्तमान बिल की प्राथमिकताओं पर भी विचार होना चाहिए।
श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः चलिए, हम मतभेद वाले सभी पहलुओं पर विचार कर लेते हैं।