414 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
श्री नजीरुद्दीन अहमदः मेरा तर्क है कि संपूर्ण विधायी प्रक्रिया भारी भूल के साथ आरंभ हुई और यह एक भूल से दूसरी भूल के साथ आगे बढ़ती गई। जब तक कि यह सबसे बड़ी भूल, जो वर्तमान बिल के रूप में सामने है, तक नहीं पहुंच गई। मेरा कहना है कि सर्वप्रथम गलती 1937 में हुई। वह गलती वहां से बढ़ी और मैं सिद्ध कर सकता हूँ कि एक गलती से दूसरी गलती होती गई और इन सभी गलतियों ने प्रवर समिति को भी शामिल कर लिया और अंततः (हस्तक्षेप) मैं बेहद गंभीरता से श्री कृष्णस्वामी भारती से पूछना चाहता हूँ कि क्या मुझे इसी तरह बाधित किया जाएगा?
माननीय अध्यक्षः यदि माननीय सदस्य अध्यक्ष को संबोधित करके अपनी बातें रखें, तो मैं सोचता हूँ कि विध्न कम होगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान्, आप यह जानकर हर्षित होंगे कि वर्ष 1937 में कानून का एक बिल पारित हुआ था, और वही हिंदू विवाहित महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार अधिनियम, 1937 बना। मेरा मानना है कि यह जल्दबाजी में बनाया गया कानून था। इसमें गले नहीं उतरने वाले और कम समझ में आने वाले कानून थे जिनसे यह सारी समस्याएं उत्पन्न हुईं। वास्तव में यह बिल डॉ. देशमुख द्वारा लिखा गया था। अतः देशमुख-मैं यहाँ यह बताकर प्रसन्न हूँ कि यह हमारे वर्तमान डॉ. देशमुख नहीं हैं-जिन्होंने हिंदू समाज की भलाई से उदासीन रहकर, वह बिल तैयार किया था। बिल का प्रभाव ऐसा था कि एक क्रमबद्ध रूप में उत्तराधिकार के कानून में कुछ परिवर्तन लाया जाए। हिंदू कानून के अनुसार, जैसा कि मैं समझता हूँ, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके पुत्र, पौत्र और परपौत्र उसके उत्तराधिकारी होते हैं। पुत्र के होने की स्थिति में भी पूर्व-मृत के बेटे अर्थात् पौत्र को भी अधिकार होता है-पौत्र अपने मृत पिता का प्रतिनिधि होता है और अपने पिता का हिस्सा उसे मिलता है। इस प्रकार पुत्र, पौत्र और परपौत्र अर्थात् तीन पीढि़यों का सम्पत्ति पर अधिकार होता है। डॉ. देशमुख इस विचार से उत्साहित थे कि विधवा को एक निश्चित स्तर और एक निश्चित अधिकार मिलना चाहिए। इसलिए उन्होंने संपत्तिधारक की विधवा को भी एक भागीदार बनाया, और संपत्तिधारक की विधवा को ही नहीं, बल्कि मृत बेटे की विधवा, मृत पौत्र की विधवा और मृत परपौत्र की विधवा को भी इसमें भागीदार बनाया। उनमें भागीदारों के अन्य क्षेत्रों में भी शामिल किया गया। अतः मेरा मानना है कि वह सब विचार शून्य था, यद्यपि लेखक देशभक्ति और समाज के कल्याण की भावना से ओत-प्रोत माने जाते थे पर मैं कहता हूँ कि वह उस समय...
माननीय श्री के. संथानमः क्या मेरे माननीय मित्र यह जानना चाहेंगे कि वह बिल वास्तव में स्व. सर एन.एन. सिरकार द्वारा स्वीकृत था, जो हिंदू कानून के एक श्रेष्ठ प्राधिकार प्राप्त व्यक्ति थे?