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को मूल विधेयक द्वारा अच्छा स्वीकार कर लिया गया था, परन्तु मौजूदा विधेयक में कहा गया है कि उस दत्तक प्रकार के सिवाय कोई भी दत्तक प्रकार स्वीकार नहीं किया जायेगा जो डॉ. अम्बेडकर के अनुसार कुछ विशेष नियमों द्वारा अधिशासित होता है। वे नियम क्या है? एक व्यक्ति को 15 वर्ष की आयु से अधिक नहीं होना चाहिए। उसे किसी व्यक्ति द्वारा दत्तक दिया जाना चाहिए। उसे विवाहित नहीं होना चाहिए। यहां कि मौजूदा बिल दत्तक के अनुसार ऐसे नियम वहां नहीं हैं। मान लीजिए कि हिंदू बेटी और दामाद की मृत्यु हो जाती है तो बेटी का बेटा दत्तक नहीं लिया जा सकता। बहन का बेटा दत्तक नहीं लिया जा सकता यहां तक कि भतीजा भी दत्तक नहीं लिया जा सकता, यदि उनके माता-पिता जीवित नहीं हैं। यह आमान्य सोच की बात है और आज भी यह नियम कि यदि कोई व्यक्ति विवाह कर लेता है तो उसे दत्तक नहीं लिया जा सकता, प्रचलन नहीं है और कानून के अनुसार प्रचलित है, यह आवश्यक नहीं है कि किसी व्यक्ति को दत्तक लिए जाने से पूर्व विवाहित नहीं होना चाहिए। यही नियम आयु के बारे में है, यानी इस तरह वे सभी इस प्रकार परिवर्तित कर दिये गये हैं कि वे मौजूदा परिस्थितियों में ठीक नहीं बैठते अथवा वे हमारे लिए उपयोगी नहीं हो सकते, अथवा वे हमें अधिशासित नहीं कर सकते।
हमने संविधान सभा में यह पारित किया था कि हम एक सिविल संहिता चाहते हैं। यदि वह हिंदू संहिता नहीं होती और यदि डॉ. अम्बेडकर को सिविल संहिता तैयार किये जाने का दायित्व सौंप जाता (मेरा विचार है कि संविधान के पारित होने के बाद उन्हें यह कार्य सौंपा जाएगा।) तो वे निश्चय ही उत्तराधिकारी के नामांकन की इस सिविल प्रथा को सम्मिलित करेंगे। एक व्यक्ति वृद्धावस्था में उनकी सहायता करने के लिए समर्थ हो सकता है, वे उसे अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करते हैं। इस संबंध में मेरा निवेदन है कि यही बिन्दु अकेला यह जानने के लिए पर्याप्त है कि वास्तव में फिर से मसौदा तैयार किया गया विधेयक, मूल विधेयक से काफी खराब है और मूल विधेयक पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया है। यदि पूरा ध्यान दिया जाता तो इस बात पर भी विचार किया गया होता। यदि यह खंड प्रति खंड विचारित किया गया होता तो आप इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचते।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं कहना चाहता हूँ कि विधेयक के इस भाग पर बहुत अधिक विचार किया गया था।
पंडित ठाकुर दास भार्गवः श्रीमान, मुझे प्रसन्नता है कि मूल विधेयक पर विचार किया गया था। तब केवल यही तकनीकी विचार-बिन्दु शेष रहता है कि यह खंड प्रति
खंड विचारित नहीं किया गया था। इसमें आन्तरिक साक्ष्य है कि इस पर इस प्रकार विचार नहीं किया गया था। इसका क्या प्रभाव पड़ा? मान लीजिए कि कुछ उपबंधों को निकाल दिया गया तो वे उपबंध किस प्रकार सम्मिलित किये गये थे। जब पूरा ध्यान अन्य विधेयक