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माननीय उपाध्यक्षः जैसा कि माननीय सदस्य आदेश संबंधी दस्तावेज से देख सकते हैं_ अन्य कई कार्य भी हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं कि यह आज का पहला बिल हो सकता है, परन्तु कल अन्य वे बिल भी आएंगे, जो सूची में उपलब्ध हैं। अतः हमें इस प्रश्न पर अधिक समय व्यतीत करने की आवश्यकता नहीं है श्री नजीरुद्दीन अहमद!
श्री बी. दास (उड़ीसाः सामान्य)ः क्या आप कृपया भाषणों के लिए कोई समय सीमा निर्धारित कर सकते हैं?
माननीय उपाध्यक्षः मैं इस तरह के विवादास्पद मामले पर कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकता। जब तक मैं इस कुर्सी पर हूँ, मैं प्रयास करूंगा निःसंदेह अध्यक्ष महोदय यह कार्य बेहतर कर सकते हैं यह देखना कि दोहराव से बचा जा सके। मैं यही सब कर सकता हूँ और मैं अपनी पूरी योग्यता से इस विषय पर उठाए जाने वाले सभी असंबद्ध मामलों को टालने का भी प्रयास करूंगा। मैं जितना संभव हो सकता है स्वतंत्रता दूंगा।
* श्री नजीरुद्दीन अहमदः (पं. बंगालः मुसलमान)ः उपाध्यक्ष महोदय, यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि इस बिल पर होने वाली चर्चाओं में जो बाधाएं आई हैं, सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि इस बिल की राजकोषीय अवधि और बीच-बीच में होने वाली बातचीत के अंतराल के बाद मूर्खता-दिवस पर गंभीर चर्चा फिर से बहाल की जानी चाहिए। पिछली बार जब मैंने बताया था कि बिल बहुत जल्दबाजी में गत 9 अप्रैल को प्रवर समिति को भेजा गया था, कुछ माननीय सदस्यों ने हमें यह याद दिलाया था कि 9 अप्रैल, 1 अप्रैल से बहुत निकट होती है अतः किसी न किसी तरह यह बिल 1 अप्रैल (मूर्खता दिवस) से जुड़ा हुआ है। इस दिन, हम एक-दूसरे से हास्य-विनोद की भावना से मिलते हैं। हम नकली निमंत्रण पत्र भेजते हैं, नकली शादियों की घोषणा करते हैं और अन्य नकली चीजें अमल में लाते हैं।
श्रीमती अम्मू स्वामीनधन (मद्रासः सामान्य)ः श्रीमान्, क्या हिंन्दू कोड के साथ इन बातों का कोई संबंध है? अभी आपने कहा है कि किसी असंगत चर्चा की अनुमति नहीं दी जाएगी। क्या ‘ऑल-फूल्स-डे’ (मूर्खता दिवस) का हिंदू संहिता के साथ कोई संबंध है?
माननीय उपाध्यक्षः मैं माननीय सदस्य को बात ठीक से सुन नहीं सका हूँ जिससे इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके कि क्या यह असंगत है अथवा नहीं।
श्री नजीरुद्दीन अहमदः श्रीमान् मैंने केवल उस संतोषजनक तरीके पर जोर दिया है, जिस तरीके से बिल समय-समय पर लाया जा रहा है। इस तरह के महत्वपूर्ण और
ऽसी.ए. (विधि.) डी, खंड 3, भाग II, 1 अप्रैल, 1949, पृष्ठ 2213-43