अनुभाग दो - प्रवर समिति द्वारा संशोधित तत्कालीन हिंदू संहिता सहित डॉ. अम्बेडकर द्वारा तैयार हिंदू संहिता विधेयक का प्रारूप - Page 435

420 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्तरीय बिल के लिए आवश्यक है कि इस पर माननीय सदस्यों द्वारा बैठकर लगातार ध्यान दिया जाए।

पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेयः बैठकर लगातार किसलिए?

श्री नजीरुद्दीन अहमदः पंडित मैत्रेय ने गलत सोचा है। लगातार बैठने से मेरा आशय ‘अंडे देना’ नही था। श्रीमान्, इस तरह के महत्वपूर्ण बिल के लिए आवश्यकता है कि सदस्यगण लंबे समय तक बैठकर इस पर विचार करें। इस मामले पर लंबे अंतरालों के बाद विचार करते रहने से यह हानि होगी कि सदस्यों की विचार शृंखला भंग हो जाएगी और उनके लिए यह समझना बहुत कठिन हो जाएगा कि अभी तक क्या-क्या कहा जा चुका है। इससे प्रत्येक अवसर पर एक बात को दूसरी बात से जोड़ना कठिन हो जाता है। अतः मेरा मानना है कि बिल के साथ अथवा सदन के साथ गंभीरता से पेश नहीं किया जा रहा है।

पिछली बार जब मैं इस महत्वपूर्ण विधेयक के इतिहास के बारे में बात कर रहा था, तो मैंने बताया था कि हिंदू विवाहित महिलाओं की सम्पत्ति का अधिकार अधिनियम, 1937 में के दौरान पहली गलती वर्ष 1937 में हुई थी।

वह गलती विधायिका के पास बिल को शीघ्रता से ले जाने की थी और पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना इस तरह की जटिल प्रकृति के बिलों को पारित करने की थी। वास्तव में, उस समय उस सदन के एक माननीय सदस्य श्री देशमुख ने एक अच्छा विचार रखा था। किंतु उस विषय पर पर्याप्त विचार-विमर्श किए बिना वे सदन के समक्ष आए और उन्होंने सदन में खुशी-खुशी उस बिल को पास कर दिया। जब उस अधिनियम के द्वारा, कुछ महिलाओं को अपने पुत्रों, पौत्रों और पर-पौत्रों सहित प्रत्यक्ष उत्तराधिकार मिल गया था। उन्हें स्वतंत्र अधिकार प्रदान किया गया था। वे न केवल हिंदू महिला के अधिकार, किन्तु पूर्णतः हस्तांतरणीय और उत्तराधिकार के अधिकार थे। उसके फौरन बाद, बंगाल के एक विख्यात वकील श्री ऋषीन्द्रनाथ सरकार ने कुछ कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित किया जो उस अधिनियम के संबंध में उठ सकती थीं। श्री ऋषिन्द्रनाथ सरकार एक विख्यात वकील हैं और हिंदू महिलाओं की सम्पत्ति के अधिकार अधिनियम और उससे जुड़े अधिनियमों की एक पाठ्य पुस्तक के लेखक भी हैं। उन्होंने कुछ ऐसी उत्तराधिकार संबंधी कठिनाईयों का हवाला दिया जो बिल के संबंध में उठ सकती थीं, और वर्ष 1938 में, वह अधिनियम, 1938 के अधिनियम XVI के रूप में संशोधित करना पड़ा। तथापि, समस्या सुलझी नहीं और नई कठिनाइयां सामने आने लगी। उस अधिनियम से एक विशेष कठिनाई सामने आई, जैसे कि उसे 1938 में संशोधित दिया गया था। परन्तु उस अधिनियम में संशोधन के बाद भी, मृतक की विधवा,पुत्र की विधवा, पौत्र की विधवा और पर-पौत्र की विधवा को अधिकार देने