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से पुत्री की स्थिति के मद्देनजर पर्याप्त कठिनाइयां सामने आयी थीं। वास्तव में, वहां बहुत बड़ी विसंगति पैदा हुई थी और श्री सरकार ने पुनः संकेत किया उस कठिन परिस्थिति की जो पुत्री को लेकर थी। इस सवाल पर पूरे देश में विरोध हुआ था, और हमने देखा है कि पुत्री की स्थिति को स्पष्ट करने, उसे भी पुत्र, पौत्र, तथा अन्य व्यक्तियों की विधवाओं के समान अधिकार देने के लिए लगभग आधा दर्जन बिल विधान सभा में प्रस्तुत किए गए थे। वे बिल सदन में प्रस्तुत किए गए थे और उन्हें कार्य-सूची में भी शामिल किया गया था। मेरा विश्वास है कि पंडित लक्ष्मी कांत मैत्रेय जैसे सदन के अनुभवी सदस्य को भी उस स्थिति की याद होगी जब तत्कालीन सरकार के सामने अनेक बिल-लगभग छह बिल रखे गए थे। तत्कालीन गृहमंत्री सर रेगिनाल्ड ने उस समय सदन में यह कहा था कि सामाजिक मामलों में पर्याप्त विचार किए बिना ही हमेशा खराब मामलों को विधायिका में भेज दिया जाता है। अतः कठिनाई तब और अधिक बढ़ जाती है, जब ज्यादा से ज्यादा कानून बनाने होते हैं। अतः वे तत्कालीन सदस्यों की स्थिति से भी पूर्ण सहानुभूति रखते थे और वे इस बात से सहमत थे कि मामलों की हर तरह से पूरी तरह जांच की जाए। इसी में ‘राउ समिति’ का गठन संभव हुआ। उस समिति ने ड्राफट बिल तैयार किया और विभिन्न व्यक्तियों को प्रश्नावली बनाकर भेजी। फिर उनसे प्राप्त उत्तरों पर विचार-विमर्श करके उनका विश्लेषण किया और एक अन्य बिल तैयार किया। परन्तु अपने इस कार्य में आगे बढ़ने से पूर्व समिति को एक अन्य कठिनाई का सामना करना पड़ा। उन्हें पता चला कि वर्ष 1937 और 1938 के अधिनियमों में एक अन्य भयंकर भूल थी। वह, यह कि 1937 का अधिनियम, जो 1938 के अधिनियम के द्वारा संशोधित हुआ था, कृषि भूमि पर लागू नहीं हुआ था। इस संबंध में जो कठिनाई सामने आई वह, यह भी कि 1937 का प्रथम अधिनियम जब विधानसभा द्वारा पारित हुआ था, तब इस विषय को केंद्र द्वारा संज्ञेय नहीं माना गया था।
माननीय उपाध्यक्षः सदन को दोपहर 2.30 बजे तक के लिए स्थगित किया जाता है।
तत्पश्चात् सदन दोपहर के भोजन के लिए 2.30 बजे तक स्थगित कर दी गई।
दोपहर के भोजन के बाद 2.30 बजे सदन की कार्रवाई पुनः आरंभ हुई।
माननीय अध्यक्ष (माननीय श्री जी.वी. मावलंकर)ः ने अपना स्थान ग्रहण किया।
श्रीमती एनी मॅस्क्रेनी (ट्रावनकोर राज्य)ः मैं एक व्यवस्थागत बिंदू उठाना चाहती हूँ। क्या मैं जान सकती हूँ कि क्या इस सदन के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि वह सदन के पूरे सत्र में उपस्थित रहे?
माननीय अध्यक्षः यह व्यवस्थागत आपत्ति नहीं है यदि कोई सदस्य न चाहे तो उसे पूरी चर्चा में उपस्थित रहना आवश्यक नहीं है। किंतु मैं एक राय दूंगा। यदि कोई सदस्य, किसी बिल के समर्थन में अथवा विरोध में कोई टिप्पणी करता है, तो उसका कर्तव्य है कि वह उसका उत्तर सुनने के लिए भी सदन में उपस्थित रहे।